बचपन की देखभाल और शिक्षा – कोई बच्चों का खेल नहीं

“बचपन की देखभाल और शिक्षा के क्षेत्र में निवेश किया गया हर एक डॉलर बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक परिणाम पैदा करता है|” – प्रो जेम्स हेकमैन (अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता)

बचपन के पहले छ: वर्ष सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते है, क्योंकि इसी समय में मानसिक विकास सबसे तीव्र गति से होता है| इस समय के विकास में ना सिर्क स्वास्थय, पोषण और देखभाल की गुणवत्ता जरुरी है बल्कि साथ में दिए जाने वाले वातावरण का भी महत्त्व होता है| इस उम्र के अनुभवों का असर आने वाले कई वर्षो तक दिखाई देता है| जीवन के पहले तीन वर्षों को भाषा और शब्दावली के विकास में सबसे महत्वपूर्ण होते है| उच्च गुणवत्ता वाले ECCE (early childhood care and education) प्रोग्राम जिनमे बच्चों को भाषा सम्बंधित गतिविधियाँ करवाई जाती है, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में भी मदद करते हैं|

प्रारंभिक शिक्षा के कई लाभ होने के बावजूद आज भी हमारे देश में ऐसे शिक्षा संस्थानों की कमी है| भारतवर्ष में आज भी सिर्क १.१% शिशु प्रीस्कूल में दाखिला लेते है जबकि फ्रांस और स्कॉटलैंड जैसे देशों में यह संख्या १००% तक है| यही नहीं हमारे देश में प्रीस्कूल शिक्षण को लेकर अभी भी कोई तयशुदा मापदंड नहीं है| इन सभी बातों का असर प्रीस्कूल में दी जाने वाली सुविधों पर साफ़-साफ़ दिखाई देता है|

सन १९९६ में सर्वप्रथम NCERT ने निर्देशिका जारी की थी जिसमें ECCE के क्षेत्र में काम करने रहे संस्थओं के लिए न्यूनतम तय दिशा-निर्देश थे| उनमे से कुछ निर्देश इस प्रकार थे:

व्यापक पहलु विशिष्ट दिशानिर्देश
बुनियादी ढांचे एवं सुविधाएँ विद्यालय की भौगोलिक स्तिथि, खेलने के लिए स्थान, स्वचा शुद्ध पेयजल की उपलब्धता, प्रसाधन, सोने के लिए स्थान एवं भंडार गृह|
उपकरण और सामग्री बड़ी मांसपेशियों के विकास के लिए बाहरी उपकरण/ सामग्री, आंतरिक उपकरण/ सामग्री, प्राथमिक चिकित्सा किट
सुरक्षा एवं बचावन खेल-कूद वाले क्षेत्र की सुरक्षा, स्वतः बंद होने वाले दरवाज़े ना लगाना, बच्चों को नुकसानदेह  किसी भी वास्तु के लिए पृथक भंडारण व्यवस्था; जो उनके पहुच से दूर न हो, बच्चों से सम्बंधित सभी वस्तुओं का समय समय पर रखरखाव एवं नुकीली वस्तुओं के उपयोग पर रोक|
कर्मचारी कर्मचारियों की उपलब्धता, शिक्षक-छात्र अनुपात, कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता एवं तनख्वाह|
प्रवेश की उम्र प्रीस्कूल के लिए उपयुक्त कक्षानुसार उम्र को दर्शाता है
परवेश प्रक्रिया पुरानी प्रवेश प्रक्रियाओं के बजाय किसी दूसरी प्रक्रिया को अपनाना
प्रोग्राम समय, पाठ्यक्रम एवं पढ़ने का तरीका|
प्रलेखन प्रवेश रिकॉर्ड, प्रगति रिपोर्ट, टीचर्स डायरी, स्टाफ एवं छात्रों का उपस्थिति पत्रक, आय-व्यय, वस्तुओं का लेखाजोखा एवं कर्मचारियों से सम्बंधित जानकारी|

वर्तमान में ECCE  केन्द्रों के पाठ्यक्रम में कोई समानता नहीं है| प्रीस्कूल अपने केंद्र पर उपलब्ध सामान के आधार पर पाठ्यक्रम तय करते हैं| हालाँकि भारत सरकार द्वारा सुझाये गए “राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रुपरेखा” में प्रीस्कूल पाठ्यक्रमों के बारे में कहता है-

“इस उम्र में बच्चों में बड़ी तेजी से शारीरिक एवं मानसिक विकास होता हैं| इसी उम्र में बच्चें आत्म-निर्भर एवं उत्सुक नज़र आते है| जैसे जैसे उनका उनका शारीरिक विकास होता है वे सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से विकसित और परिपक्व होते जाते है| वे बहुत जल्दी अपने वातावरण में घुल-मिल जाते है और धीरे-धीरे अपनी कल्पनाशीलता के द्वारा भूतकाल एवं वर्तमान में आये अनुभवों को संजोने का प्रयास करते है| खेल-खेल में बच्चों का सर्वंगीण विकास होता है जिसके लिए एकदम सरल एवं बार-बार दोहराई जाने वाले हाव-भाव, जिसमे किसी वास्तु का समावेश भी सम्मिलित हो सकता है| इस उम्र में ही भाषा का विकास होता है, संकेतों की भाषा समझ में आने लगती है| इसी उम्र में अहंकार भी जागृत होता है जिसके द्वारा दो लोगो के विचारों की असमानता भी बच्चों को समझ में आती है| इसी समय में बच्चें कल्पनालोक में भी विचरण करते है| शारीरिक क्षमता, वैचारिक परिपक्वता एवं उचित सामाजिक विन्यास के लिए आवश्यक विस्वास, आदतें एवं रवैया तैयार होने के लिए प्रीस्कूल का समय सबसे प्रभावशाली एवं उचित होता है| सभी प्रीस्कूल चलने वालों कू इस बात की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए अपने पाठ्यक्रम की रचना करना चाहिए ताकि इन कक्षाओं में पढने के इच्छुक बच्चों का समग्र विकास सुनिश्चित किया जा सके|”

भारत सरकार ने लम्बे और उपेक्षापूर्ण रवैये के बाद अंतत: प्रीस्कूल नीतियों की तरफ ध्यान दिया है| ECCE नीति का लक्ष्य गली-मोहल्लों में तेजी से खुल रहे झूलाघर, प्रीस्कूलों जिनका कोई शैक्षणिक स्तर नहीं है उनका सुधार करना है| केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा तैयार नीति के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित है:

१) सभी बच्चों को सम्मिलित करने हेतु अनुकूलन कार्यनीति

२) पाठ्यक्रम की गुणवत्ता एवं स्तर

३) समुचित विकास सुनिश्चित करने के लिए समाज एवं परिवार को समाविष्ट करना

४) व्यवसायिकता को बढ़ावा देना

५) बच्चों के व्यवस्थित विकास एवं सुरक्षा को बढ़ावा देना

हम उम्मीद करते है की जल्द ही एक राष्ट्रीय परिषद् का गठन होगा को प्रीस्कूल और झूलाघरों में शैक्षणिक मानकीकरण, प्रशिक्षित शिक्षक, स्वछता एवं स्वास्थ्या पर दिशानिर्देश निर्धारित करेगा| कुछ प्रस्तावित दिशानिर्देश निम्नानुसार है-

१) ३-४ घंटे पढाई

२) ३० बच्चों की कक्षा के लिए कम से कम ३५ वर्ग मीटर का कमरा

३) न्युन्यतम ३० वर्ग मीटर का खुला बाहरी इलाका|

४) सुरक्षित भवन

५) सुगम, स्वच्छ एवं हरा-भरा क्षेत्र

६) स्वच्छ शुद्ध पेयजल

७) प्राथमिक उपचार सुविधा

८) शिक्षण सहायक सामग्री

९) भोजन एवं सोने के समय का नियंत्रण

१०) ३ से ६ वर्ष के बच्चों के लिए बालक-शिक्षक अनुपात २०:१ तथा ३ वर्ष से कम आयु वर्ग से लिए १०:१ हो|

‘ज्ञानकृति’ ने “प्रीस्कूल चले हम” अभियान आरम्भ किया है जिसके द्वारा उच्चस्तरीय प्रारंभिक शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने का प्रयास किया जा रहा है| विभिन्न अभियानों के माध्यम से हम अपने अभियान को बढ़ावा दे रहे है|

नोट: लेखक, योगराज पटेल, ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English Translation: http://www.gyankriti.com/blog/early-childhood-care-and-education-no-childs-play-2/