Monthly Archives: September 2014

“मुझे ये चाहिए, मैं कुछ नहीं जानता” – नखरों के राजकुमार

माता-पिता बनने के लिए किसी शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं होती और ना ही इससे यह पुष्टि होती है कि हम अपने बच्चों की मानसिक अवस्था को अच्छे से समझते हैं। जब भी बच्चों के व्यव्हार से जुडी कोई भी समस्या आती है हम सोचने लगते है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? अनेक समस्याओं में से एक है ”ध्यान आकर्षित करने हेतु ’नखरे’ करना”| मानव जाति अन्य प्रजातियों की तुलना में बच्चों को पालने में बहुत ज्यादा समय देती है; यह देश एवं क्षेत्र की परंपरा पर भी निर्भर करता है|  जिस क्षण शिशु माता पिता के पास आता है वह सबके आकर्षण का केंद्र बन जाता है।इसी के साथ रूठना,मनाना और प्यार करना शुरू हो जाता है| क्या हम बच्चों को खुद से खेलना सिखाते हैं? खुद के साथ रहना सिखाते हैं? जब तक शिशु 2 साल का होता है यह उसकी आदत बन जाती है। उनके लिए हम हमेशा उनके आसपास, उनके साथ होते हैं, उनकी असुरक्षा छुप जाती है और उनकी हर इच्छा पूरी होती है। उन्हें सामाजिक बनाने के लिए हम उनके साथ नकारात्मक व्यवहार करने लगते हैं, जैसे ‘ना’ कहना , ‘मत करो’, इत्यादि। हमारा यह बर्ताव उनके अन्दर एक अलग तरह की समस्या पैदा करता है, वे हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए गुस्सा करने लगते हैं।

इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए कुछ सुझाव हैं:

  1. स्वास्थ्य: सबसे पहले नब्ज़ देखें। देखिये कि बच्चों की ज़रूरतों का ध्यान रखा जा रहा हैं। कहिं वह भूखा, प्यासा, बीमार या थका हुआ तो नहीं है? यह सुनिश्चित करने के बाद अगले पड़ाव पर जाईये।
  2. नज़रंदाज़ कीजिये और बढ़ जाईये: यह बहुत अजीब लगता है जब हम इस बारे में सोचते हैं। “क्या यही रास्ता है?” पर विश्वास कीजिये यह काम करता है। यह पहला कदम है उनसे उनकी पहचान कराने का और हर समय ध्यान आकर्षित नहीं कराने का। ऐसा  करने से वे समझ जाते हैं “यह काम नहीं करेगा”। साथ ही इससे उन्हें समय मिलता है कि वे अपनी भावनाओं पर काम करें।
  3. बात टालने की कोशिश करे: यह तरीका जादुई है। जब वे हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं तब उनका ध्यान किसी और क्रिया की तरफ केन्द्रित कर दीजिये। कुछ और दिलचस्प दिखाईये, रहस्य साझा कीजिये, और गाना गाईये। मासूम विचारों को विचलित करना बहुत आसान है। भोला बने, नीचे गिर जाने का नाटक करें, उन्हें विचलित करने के लिए कुछ भी कीजिये। इसका अभ्यास कीजिये, यह बहुत आसान है।
  4. शांत रहिये, जैसा कि आप उम्मीद करते हैं: आप चाहते हैं कि बच्चा शांत रहे जबकि परिस्थितियां
    उसके अनुकूल नहीं होती हैं और वह गुस्सा करना चाहता है। यदि आप चिढने और चिल्लाने लगेंगे तो बच्चा शायद कभी नहीं समझ पायेगा। यदि हम भी उनके जैसे ही गुस्सा करने लगे तो हम उन्हें शांत रहना कैसे सिखायेंगे?
    हर तरह की परिस्थिति में शांत रहकर खुद को आदर्श साबित कीजिये। जब वे आपको आदर्श मानकर, शांत रहकर आपका प्रतिबिम्ब बने तब उन्हें प्यार करें  एवं उन्हें सराहें।
  5. हिम्मत न हारें: इसी कारणवश आपने  पहले “नहीं” कहने का निर्णय लिया था। अचानक, सिर्फ बच्चे के गुस्सा करने के बाद वो बात सही नहीं हो जाती। साथ ही, यदि आपने एक बार हार मान ली तो बच्चे को अपनी इच्छा पूरी कराने का नया तरीका मिल जाता है। इस बात का सदैव ध्यान रखे, यदि इससे बच्चे पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता तो शुरू में ही ”हाँ” कह दे; लेकिन एक बार ”नहीं” कहने के बाद अपना निर्णय ना बदले|
  6. गुदगुदी करना: यह तरीका बहुत प्रभावशाली है I मैंने खुद किया है।  जब भी मैं चाहती थी कि मेरा बेटा मेरी बात सुने और अनुपालन करे मैं उसे गुदगुदी करती थी। असल में यह एक जटिल स्थिति को सकारात्मक रुख पर ख़तम करता है| साथ ही इससे उनका परिचय हँसनें खिलखिलाने से होता है। हँसनें से तो आधी समस्या वैसे ही समाप्त हो जाती है |
  7. चिढ़ने का कारण समझिये: इसे पहचानिए , बच्चे को गुस्से के स्त्रोत से दूर कीजिये। उन्हें शांत रहने के लिए प्रोत्साहित करें, अगर वे ऐसा करते है तो उन्हें उनकी मर्ज़ी का कुछ अच्छा काम करने का वादा कीजिये। उन्हें कहिये कि अगर वे ऐसा करेंगे तो ताकतवर, बड़े व समझदार बनेंगे।. उनसे वादा कीजिये कि आप उन्हें कहानी सुनायेंगे, साथ समय व्यतीत करेंगे, उनके साथ खेलेंगे जो भी उन्हें अच्छा लगता है। अगर वे ऐसा करते हैं तो आप भी अपना वादा ज़रूर पूरा करें।
  8. साथ में समय व्यतीत करें: मात्र 5 मिनट का सकारात्मक समय उन्हें उनकी भावनाओ को हल करने व् आपका दृष्टिकोण समझने में बहुत मदद करेगा। केवल आप और आपका बच्चा बिना किसी अवरोध के, एक दूसरे से बात करे, उसे लाड-प्यार दे | यह आपके लिए भी बहुत आनंददायक क्षण होगा |

ये सभी सुझाव काम करते हैं। कभी ये तो कभी वो, पर काम जरुर करते है | उन्हें सिखाते-सिखाते हम भी बहुत कुछ सीख जाते है|

नोट: लेखिका, ऋतू सिंह, तुलसी नगर, इंदौर शाखा की प्रधानाध्यापिका हैं। उन्हें भारत व विदेश में शिक्षा के क्षेत्र में कई वर्षों का अनुभव है। यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English version: http://www.gyankriti.com/blog/i-am-here-and-i-want-this-tantrum-king/

रचना सक्सेना द्वारा अनुवादित |

बच्चों को खिलोनों का महत्त्व समझाये

“मेरी बेटी के पास बहुत सारे खिलौने हैं, किन्तु वह उनका महत्त्व नहीं समझती।”- विद्या गौर, जो एक सात साल की बच्ची की माँ हैं | विद्या खुद दो तीन खिलौनों के साथ बड़ी हुयी, और हर साल जन्मदिन पर एक नया खिलौना उनमे जुड़ जाता था ।आजकल के सुविधायुक्त जीवन में बच्चे टोकरी भर खिलौनों के साथ बड़े होते हैं, और बहुत मुश्किल है उन्हें यह समझाना कि भारत के 4 करोड़ 80 लाख में से अधिकतम बच्चों के लिए ये खिलौने कितने अनमोल हैं।

“मुझे कोई चिंता नहीं अगर मेरा खिलौना टूट जाता है, मुझे नया मिल जायेगा।” यह कहना है 6 साल के रिषभ वर्मा का। उसे नहीं पता कि उसके माता पिता को ऐसे कथन क्यों पसंद नहीं। रिषभ की ही तरह अनेक मध्यम वर्गीय बच्चे परवाह नहीं करते यदि उनके खिलौने गुम हो जाये या टूट जाये, क्योकि उन्हें पता है कि उन्हें दूसरे मिल जायेंगे।

यहाँ कुछ तरीके है जिससे बच्चों को वस्तुओं का महत्त्व समझाने में मदद होगी –

जरूरतमंद लोगों को बांटना

उनका ध्यान उन बच्चों की तरफ आकर्षित करें जो इन सुख सुविधाओं से वंचित हैं। समझाईये कि वे कम कपड़े व भोजन और बिना खिलौनों के साथ कैसे जीते हैं। अपने बच्चों से कहिये कि वे उन भोजन, कपड़े और खिलौनों के पैकेट बनाये जो उनके लिए पुराने हो गए हैं। उनकी पसंद आपसे अलग हो सकती है, किन्तु उन्हें स्वीकारने के लिए तैयार रहें।एक उपयुक्त परिवार को ढूंढे जिसे यह पैकेट दे सकें। ये परिवार निर्माण करने वाले मजदूर जो टेंट में रहते हैं या फिर आपके नौकर भी हो सकते हैं। हांलाकि बच्चों को यह समझाना भी आवश्यक है कि जब वे समाज के दूसरे तबके के लोगों से मिलें तो बहुत ज्यादा दया, घृणा या नम्रता न दिखाएँ। साथ में जाईये और उन्हें वो पैकेट दीजिये। चैरिटी करने से आपके बच्चे को एहसास होगा कि कम सुविधाओं वाले बच्चों के लिए ये कपड़े और खिलौने कितने मूल्यवान हैं और साथ ही उन्हें चैरिटी का सुखद अनुभव भी होगा।

नई चीजों की जांच करना

जन्मदिन पर ढेर सारे तोहफे मिल जाने पर कुछ तोहफे उतने आकर्षक नहीं लगते | इस्तेमाल करने से पहले अपने बच्चे को पहले हर नयी चीज़ को ध्यान से देखने दें।अगर वे कोई ऐसे खिलौने/गेम/पाठ्यसामग्री है जो बच्चे के पास पहले से है, या उसे उसकी आवश्यकता नहीं है, तो वह उसे एक बक्से में सम्हाल कर रख ले। ऐसे तोहफे किसी जरूरतमंद को दे सकते है, तोहफे के रूप में किसी और को दे सकते हैं या बाद में उपयोग में ले सकते हैं|

रीसायकल करना

पुराने खिलौने किसी दूकान या वेबसाइट पर बेचे भी जा सकते हैं। इस तरह बच्चे जागरूक होंगे कि उन चीज़ों को किसी को देकर या बेचकर कुछ समझदारी का कम कर रहे हैं बजाये के घर पर  बिना उपयोग में लाये पड़े हुए हैं। इसके बदले में उन्हें अनुमति दी जा सकती है कि उन्हें जिस चीज़ की आवश्यकता है वो खरीद सकते हैं।

उत्सुकता बढ़ाये

कोई भी नयी वस्तु उपहार में देने से पहले उसके बारे में बच्चे से बात करके या इन्टरनेट पर उससे सम्बंधित सामग्री दिखाकर दिलचस्पी बढ़ाये। एक बार उसकी जिज्ञासा प्रज्वलित हो गयी वो उस वस्तु का महत्त्व समझेगा।

अनुचित प्रयोग को नियंत्रित करें

यदि आपका बच्चा अपने खिलौनों को लेकर लापरवाह है, उन्हें फेंकता है या बिस्तर के नीचे धकेलता है, उनसे वह वापस ले लीजिये। जब तक आपको नहीं लगता कि वह दोबारा ऐसा नहीं करेगा, खिलौना अपने पास ही रखिये, या किसी को दे दीजिये।जब वह उस खिलौने को गँवा देगा तब वह उसके लिए जरुरत बन जायेगा, हो सकता है वह आपसे वो खिलौना मांग ले इसलिए कुछ देर उसे अपने पास ही रखिये|

नोट: लेखक, योगराज पटेल, ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English version: http://www.gyankriti.com/blog/does-your-child-value-her-toys/

रचना सक्सेना द्वारा अनुवादित |

“I AM HERE AND I WANT THIS” – Tantrum King

Becoming parents requires no degree; also it does not guarantee our understanding the psychology of the little ones. Sometimes we are so baffled when small pin like situations arise and we are in a fix. How to deal with this one? One among the many is

“Children seeking attention and throwing tantrums”

Humans have the longest relationship nourishing period; it stretches according to the culture of the country. The moment a child arrives to the parent, it becomes the centre of attraction for them. Then starts the fussing, loving and nurturing part. Do we also teach the children to play by themselves, to be with themselves? This turns into a habit by the time a child turns 2 years old. For them we are always around, we are always there, their insecurities are covered up and their desires fulfilled. In the process of readying them for the society, we start a reverse process of denials, saying no, don’t, afterwards. This initiates a different problem in child seeking our uninterrupted attention by throwing tantrum.

Here are some helpful tips to deal with this:

  1. Health: First and foremost check the vitals. See, if the child has his needs taken care of. Whether or not he is either, hungry, thirsty, sick or tired. Once this is done move to other steps of how to deal with it.
  2. Ignore and Walk away: It seems to be an awkward way when we think about it. “Is this the way? “But believe me it works. It is the first step to introduce them to their own selves and not to seek attention all the time. By doing this they come to know “This doesn’t work”. Also, it gives them time to work on their emotions.
  3. Avert / Act silly: This works wonders. Just distract them towards something else from their immediate focus of attention. Point out to something else, show them something interesting, tell them a secret, and sing them a song. Innocent minds can be distracted easily. Act silly, topple over, fall down, just anything to distract. Practice the trick and OH! It can be so much easier.
  4. Stay Calm as You Seek: Is this not what it is all about. You desire for the child to stay calm when the situation is making him/her to throw tantrum. Tell the child let’s reason it out later. If you start yelling and shouting, then the child may never be able to understand. What is this fuss all about as you are reciprocating in the same way? Be the role model in displaying the calm and coolness in all the adverse situations. Love them when they display themselves as the role modelled representations of your coolness and calmness.
  5. Don’t give In: After all this is why you took the first decision of saying “no”. Suddenly, after the tantrum it cannot become right. Also, once you give in the child has discovered a new way of getting his wish fulfilled. Be careful, either say yes at the start if it does not matter in the child’s development, but do not change your decision to “yes” once said no.
  6. Tickle: This works wonderfully well. I have tried. Every time I need my son to listen to me and comply I tickle. It actually ends a complex situation on a positive note. Also, who can resist tickling? It also introduces them to laughter and smiles. And hormone to help them to do so works its wonders.
  7. The temper behind the tantrum:   Recognize it; try to remove the child from the source of the temper. Encourage them to hold it a bit longer, promise them incentives if they do so. Tell them, they grow a bit stronger, bigger, and mature if they do so. Promise them stories, together time, a play whatever interests them. Treat them as equal when they are able to deal with it.
  8. Attention time: Why not? Just five minutes of absolute positive attention time to them may help them resolve their own feelings and understand your point of view of saying no…Or other child’s reaction. Just you and your child without distractions, sharing, communication, love and care. Just pure pleasure.

All of the above works. One or the other at one of the time. It is just us learning and making them learn in the process.

Note: The author is Head Mistress at Tulsi Nagar, Indore Branch. She has several years of experience in education at reputed schools in India and abroad.

The views expressed here are personal.

हिंदी अनुवाद: http://www.gyankriti.com/blog/tantrum-hindi/