Author Archives: Rachana Saxena

About Rachana Saxena

She is working on content development and content localization at Gyankriti. She usually contributes to this blog by Hindi translations.

Home-work or Parent’s work?

One evening my 9 yrs old nephew came to me asking to help him out in his homework. When I saw his assignment I was surprised, it was four pages long story and his task was to shorten it. Wow! I didn’t get this kind of task even in high school. Then I thought educators might have taught him in class. When I asked him to read out story and explain, I was shocked he was able to read it with some wrong pronunciations but unable to explain even a single line. I tried to explain him each line but finally gave up because I realized that, firstly that assignment was not meant for his standard, and secondly school is not preparing him to learn and explore, he is being prepared only for exams. Assignments given by teachers are actually not for students but it is a task of parents. And parents always want their kids’ assignment to be best in the class so they also get involved in it. After all they have to compete with “Sharma ji’s son”.

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Assignment is just not writing work. Assignment is learning.

I still remember when I was in school, for me assignment was just to note down classwork in another notebook, what we called ‘Fair Copy’. It didn’t really help in learning or exploring something new but at least this way whatever was taught in class was being revised at home and secondly parents didn’t bother to be a part of it. In my opinion for senior students assignment should be of their level, which they can complete by themselves, without getting any help from parents or tutors.

For preschoolers assignment should not be given from school side. Instead of that preschools can provide some sort of information handout every month (like we do in the form of Gyankriti Pitara), so that parents can revise those topics at home. On the other hand parents also have to understand that toddlers have limited attention span, so instead of forcing kids to revise at a particular time, they can make learning a part of their routine. E.g. When they want to revise fruits, they can actually take their kids’ to mall and ask them names of fruits. Or can be revised at home also.

Parent involvement is helpful but we should always keep in mind that trained and experienced tutors have different style of teaching which can’t be imitated by parents. Similarly we discourage parents to send their children to tuition classes (Yes! Some parents send preschoolers to tuition). We at Gyankriti believe that parents play an important role in the learning process of their children. Not allowing tuitions ensures that parents take interest and participate in the academics of children. Continuous parental support goes a long way in enhancing academic and co-curricular performance.

Note: The author is administrative head of Gyankriti, Sudarshan Nagar branch. The views expressed here are personal.


एक शाम मेरा ९ वर्षीय भांजा मेरे पास आया और उसने मुझे उसके गृहकार्य में मदद के लिए कहा। जब मैंने उसका कार्यभार देखा तो आश्चयचकित हो गयी, वह एक ४ पन्नों की लम्बी कहानी थी जिसे उसे छोटी बनाना था। वाह! इस तरह का गृहकार्य मुझे कभी उच्च विद्यालय में भी नहीं मिला था। फिर मुझे लगा कि सम्भवतः उसे शिक्षकों ने कक्षा में सिखाया होगा। जब मैंने उसे वो कहानी पढ़ने और समझाने के लिए कहा, मैं चकित हो गई वह उस कहानी को कुछ टूटे फूटे उच्चारण के साथ पढ़ तो रहा था पर उसकी एक भी पंक्ति समझ नहीं पा रहा था। मैंने उसे हर पंक्ति का मतलब समझने की कोशिश की पर हार गई क्योकि मुझे अहसास हुआ कि, पहली बात वो कार्यभार उसकी उम्र के लिए बहुत कठिन था, और दूसरी बात कि विद्यालय उसे सीखने और खोजने के लिए नहीं अपितु केवल परीक्षा के लिए तैयार कर रहा है। शिक्षकों द्वारा दिया गया गृहकार्य असल में विद्यार्थियों के लिए नहीं अपितु अभिभावकों के लिए होता है। और अभिभावक हमेशा चाहते हैं कि उनके बच्चे का कार्य सबसे अच्छा हो इसलिए वो भी उसका हिस्सा बन जाते हैं। अंत में उन्हें “शर्मा जी के बेटे” के साथ बराबरी जो करना है।

मुझे अभी भी याद है जब मैं विद्यार्थी थी, मेरे लिए कार्यभार होता था कक्षा में कराये गए कार्य को दूसरी कॉपी, जिसे हम ‘फेयर कॉपी’ कहते थे, में लिखना। असल में ऐसा करने से कुछ नया सीखने या खोजने में कोई मदद नहीं होती थी, पर कम से कम कक्षा में जो पढ़ाया गया है उसकी पुनरावृत्ति हो जाती थी, और इसके हम अभिभावकों को इसका हिस्सा भी नहीं बनाते थे।

मेरा मत है कि विद्यार्थियों को गृहकार्य उनके स्तर का देना चाहिए, जो वे बिना अभिभावक या ट्यूटर की मदद के स्वयं कर सकें। प्रीस्कूल विद्यार्थियों को विद्यालय की ओर से गृहकार्य नहीं देना चाहिए। इसके स्थान पर प्रीस्कूल हर माह स्कूल में होने वाली गतिविधियों की जानकारी दे सकते हैं (जैसे हम ज्ञानकृति पिटारा देते हैं), ताकि अभिभावक उन विषयों की पुनरावृत्ति घर पर करवा सके।

दूसरी ओर अभिभावक को यह भी समझना होगा कि बच्चों में एकाग्रता बहुत सिमित होती है, इसलिए उन्हें किसी नियत समय पर बलपूर्वक पढ़ाने के बजाये, पढ़ाई उनकी दिनचर्या का हिस्सा बना दें। उदहारण के लिए यदि वे ‘फल’ की पुनरावृत्ति करना चाहते हैं तो बच्चों को मॉल ले जाकर फलों के नाम पूछ सकते हैं, या घर पर भी इसी प्रकार सिखा सकते हैं।

अभिभावकों की सहभागिता मददगार है, किन्तु हमे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्रशिक्षित और अनुभवी शिक्षकों का पढ़ाने का तरीका अलग होता है, जिसका अनुकरण अभिभावक नहीं कर सकते। इसी तरह हम उन अभिभावकों से भी असमर्थ हैं जो अपने बच्चों को कोचिंग क्लासेस भेजते हैं (हाँ! कुछ अभिभावक प्रीस्कूल के बच्चों को भी ट्यूशन भेजते हैं)। ज्ञानकृति का मत है कि बच्चों की पढ़ाई में माता पिता का योगदान महत्वपूर्ण है। ट्यूशन नहीं भेजना यह दर्शाता है कि बच्चों की पढ़ाई में माता पिता रूचि लेते हैं और उसका हिस्सा बनते हैं। अभिभावकों की लगातार सहायता बच्चों की अकादमिक और गैर-अकादमिक प्रदर्शन को बढ़ावा देता है।

नोट: लेखक ज्ञानकृति सुदर्शन नगर शाखा की प्रशासनिक प्रमुख हैं| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

“मुझे ये चाहिए, मैं कुछ नहीं जानता” – नखरों के राजकुमार

माता-पिता बनने के लिए किसी शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं होती और ना ही इससे यह पुष्टि होती है कि हम अपने बच्चों की मानसिक अवस्था को अच्छे से समझते हैं। जब भी बच्चों के व्यव्हार से जुडी कोई भी समस्या आती है हम सोचने लगते है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? अनेक समस्याओं में से एक है ”ध्यान आकर्षित करने हेतु ’नखरे’ करना”| मानव जाति अन्य प्रजातियों की तुलना में बच्चों को पालने में बहुत ज्यादा समय देती है; यह देश एवं क्षेत्र की परंपरा पर भी निर्भर करता है|  जिस क्षण शिशु माता पिता के पास आता है वह सबके आकर्षण का केंद्र बन जाता है।इसी के साथ रूठना,मनाना और प्यार करना शुरू हो जाता है| क्या हम बच्चों को खुद से खेलना सिखाते हैं? खुद के साथ रहना सिखाते हैं? जब तक शिशु 2 साल का होता है यह उसकी आदत बन जाती है। उनके लिए हम हमेशा उनके आसपास, उनके साथ होते हैं, उनकी असुरक्षा छुप जाती है और उनकी हर इच्छा पूरी होती है। उन्हें सामाजिक बनाने के लिए हम उनके साथ नकारात्मक व्यवहार करने लगते हैं, जैसे ‘ना’ कहना , ‘मत करो’, इत्यादि। हमारा यह बर्ताव उनके अन्दर एक अलग तरह की समस्या पैदा करता है, वे हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए गुस्सा करने लगते हैं।

इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए कुछ सुझाव हैं:

  1. स्वास्थ्य: सबसे पहले नब्ज़ देखें। देखिये कि बच्चों की ज़रूरतों का ध्यान रखा जा रहा हैं। कहिं वह भूखा, प्यासा, बीमार या थका हुआ तो नहीं है? यह सुनिश्चित करने के बाद अगले पड़ाव पर जाईये।
  2. नज़रंदाज़ कीजिये और बढ़ जाईये: यह बहुत अजीब लगता है जब हम इस बारे में सोचते हैं। “क्या यही रास्ता है?” पर विश्वास कीजिये यह काम करता है। यह पहला कदम है उनसे उनकी पहचान कराने का और हर समय ध्यान आकर्षित नहीं कराने का। ऐसा  करने से वे समझ जाते हैं “यह काम नहीं करेगा”। साथ ही इससे उन्हें समय मिलता है कि वे अपनी भावनाओं पर काम करें।
  3. बात टालने की कोशिश करे: यह तरीका जादुई है। जब वे हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं तब उनका ध्यान किसी और क्रिया की तरफ केन्द्रित कर दीजिये। कुछ और दिलचस्प दिखाईये, रहस्य साझा कीजिये, और गाना गाईये। मासूम विचारों को विचलित करना बहुत आसान है। भोला बने, नीचे गिर जाने का नाटक करें, उन्हें विचलित करने के लिए कुछ भी कीजिये। इसका अभ्यास कीजिये, यह बहुत आसान है।
  4. शांत रहिये, जैसा कि आप उम्मीद करते हैं: आप चाहते हैं कि बच्चा शांत रहे जबकि परिस्थितियां
    उसके अनुकूल नहीं होती हैं और वह गुस्सा करना चाहता है। यदि आप चिढने और चिल्लाने लगेंगे तो बच्चा शायद कभी नहीं समझ पायेगा। यदि हम भी उनके जैसे ही गुस्सा करने लगे तो हम उन्हें शांत रहना कैसे सिखायेंगे?
    हर तरह की परिस्थिति में शांत रहकर खुद को आदर्श साबित कीजिये। जब वे आपको आदर्श मानकर, शांत रहकर आपका प्रतिबिम्ब बने तब उन्हें प्यार करें  एवं उन्हें सराहें।
  5. हिम्मत न हारें: इसी कारणवश आपने  पहले “नहीं” कहने का निर्णय लिया था। अचानक, सिर्फ बच्चे के गुस्सा करने के बाद वो बात सही नहीं हो जाती। साथ ही, यदि आपने एक बार हार मान ली तो बच्चे को अपनी इच्छा पूरी कराने का नया तरीका मिल जाता है। इस बात का सदैव ध्यान रखे, यदि इससे बच्चे पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता तो शुरू में ही ”हाँ” कह दे; लेकिन एक बार ”नहीं” कहने के बाद अपना निर्णय ना बदले|
  6. गुदगुदी करना: यह तरीका बहुत प्रभावशाली है I मैंने खुद किया है।  जब भी मैं चाहती थी कि मेरा बेटा मेरी बात सुने और अनुपालन करे मैं उसे गुदगुदी करती थी। असल में यह एक जटिल स्थिति को सकारात्मक रुख पर ख़तम करता है| साथ ही इससे उनका परिचय हँसनें खिलखिलाने से होता है। हँसनें से तो आधी समस्या वैसे ही समाप्त हो जाती है |
  7. चिढ़ने का कारण समझिये: इसे पहचानिए , बच्चे को गुस्से के स्त्रोत से दूर कीजिये। उन्हें शांत रहने के लिए प्रोत्साहित करें, अगर वे ऐसा करते है तो उन्हें उनकी मर्ज़ी का कुछ अच्छा काम करने का वादा कीजिये। उन्हें कहिये कि अगर वे ऐसा करेंगे तो ताकतवर, बड़े व समझदार बनेंगे।. उनसे वादा कीजिये कि आप उन्हें कहानी सुनायेंगे, साथ समय व्यतीत करेंगे, उनके साथ खेलेंगे जो भी उन्हें अच्छा लगता है। अगर वे ऐसा करते हैं तो आप भी अपना वादा ज़रूर पूरा करें।
  8. साथ में समय व्यतीत करें: मात्र 5 मिनट का सकारात्मक समय उन्हें उनकी भावनाओ को हल करने व् आपका दृष्टिकोण समझने में बहुत मदद करेगा। केवल आप और आपका बच्चा बिना किसी अवरोध के, एक दूसरे से बात करे, उसे लाड-प्यार दे | यह आपके लिए भी बहुत आनंददायक क्षण होगा |

ये सभी सुझाव काम करते हैं। कभी ये तो कभी वो, पर काम जरुर करते है | उन्हें सिखाते-सिखाते हम भी बहुत कुछ सीख जाते है|

नोट: लेखिका, ऋतू सिंह, तुलसी नगर, इंदौर शाखा की प्रधानाध्यापिका हैं। उन्हें भारत व विदेश में शिक्षा के क्षेत्र में कई वर्षों का अनुभव है। यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English version: http://www.gyankriti.com/blog/i-am-here-and-i-want-this-tantrum-king/

रचना सक्सेना द्वारा अनुवादित |

बच्चों को खिलोनों का महत्त्व समझाये

“मेरी बेटी के पास बहुत सारे खिलौने हैं, किन्तु वह उनका महत्त्व नहीं समझती।”- विद्या गौर, जो एक सात साल की बच्ची की माँ हैं | विद्या खुद दो तीन खिलौनों के साथ बड़ी हुयी, और हर साल जन्मदिन पर एक नया खिलौना उनमे जुड़ जाता था ।आजकल के सुविधायुक्त जीवन में बच्चे टोकरी भर खिलौनों के साथ बड़े होते हैं, और बहुत मुश्किल है उन्हें यह समझाना कि भारत के 4 करोड़ 80 लाख में से अधिकतम बच्चों के लिए ये खिलौने कितने अनमोल हैं।

“मुझे कोई चिंता नहीं अगर मेरा खिलौना टूट जाता है, मुझे नया मिल जायेगा।” यह कहना है 6 साल के रिषभ वर्मा का। उसे नहीं पता कि उसके माता पिता को ऐसे कथन क्यों पसंद नहीं। रिषभ की ही तरह अनेक मध्यम वर्गीय बच्चे परवाह नहीं करते यदि उनके खिलौने गुम हो जाये या टूट जाये, क्योकि उन्हें पता है कि उन्हें दूसरे मिल जायेंगे।

यहाँ कुछ तरीके है जिससे बच्चों को वस्तुओं का महत्त्व समझाने में मदद होगी –

जरूरतमंद लोगों को बांटना

उनका ध्यान उन बच्चों की तरफ आकर्षित करें जो इन सुख सुविधाओं से वंचित हैं। समझाईये कि वे कम कपड़े व भोजन और बिना खिलौनों के साथ कैसे जीते हैं। अपने बच्चों से कहिये कि वे उन भोजन, कपड़े और खिलौनों के पैकेट बनाये जो उनके लिए पुराने हो गए हैं। उनकी पसंद आपसे अलग हो सकती है, किन्तु उन्हें स्वीकारने के लिए तैयार रहें।एक उपयुक्त परिवार को ढूंढे जिसे यह पैकेट दे सकें। ये परिवार निर्माण करने वाले मजदूर जो टेंट में रहते हैं या फिर आपके नौकर भी हो सकते हैं। हांलाकि बच्चों को यह समझाना भी आवश्यक है कि जब वे समाज के दूसरे तबके के लोगों से मिलें तो बहुत ज्यादा दया, घृणा या नम्रता न दिखाएँ। साथ में जाईये और उन्हें वो पैकेट दीजिये। चैरिटी करने से आपके बच्चे को एहसास होगा कि कम सुविधाओं वाले बच्चों के लिए ये कपड़े और खिलौने कितने मूल्यवान हैं और साथ ही उन्हें चैरिटी का सुखद अनुभव भी होगा।

नई चीजों की जांच करना

जन्मदिन पर ढेर सारे तोहफे मिल जाने पर कुछ तोहफे उतने आकर्षक नहीं लगते | इस्तेमाल करने से पहले अपने बच्चे को पहले हर नयी चीज़ को ध्यान से देखने दें।अगर वे कोई ऐसे खिलौने/गेम/पाठ्यसामग्री है जो बच्चे के पास पहले से है, या उसे उसकी आवश्यकता नहीं है, तो वह उसे एक बक्से में सम्हाल कर रख ले। ऐसे तोहफे किसी जरूरतमंद को दे सकते है, तोहफे के रूप में किसी और को दे सकते हैं या बाद में उपयोग में ले सकते हैं|

रीसायकल करना

पुराने खिलौने किसी दूकान या वेबसाइट पर बेचे भी जा सकते हैं। इस तरह बच्चे जागरूक होंगे कि उन चीज़ों को किसी को देकर या बेचकर कुछ समझदारी का कम कर रहे हैं बजाये के घर पर  बिना उपयोग में लाये पड़े हुए हैं। इसके बदले में उन्हें अनुमति दी जा सकती है कि उन्हें जिस चीज़ की आवश्यकता है वो खरीद सकते हैं।

उत्सुकता बढ़ाये

कोई भी नयी वस्तु उपहार में देने से पहले उसके बारे में बच्चे से बात करके या इन्टरनेट पर उससे सम्बंधित सामग्री दिखाकर दिलचस्पी बढ़ाये। एक बार उसकी जिज्ञासा प्रज्वलित हो गयी वो उस वस्तु का महत्त्व समझेगा।

अनुचित प्रयोग को नियंत्रित करें

यदि आपका बच्चा अपने खिलौनों को लेकर लापरवाह है, उन्हें फेंकता है या बिस्तर के नीचे धकेलता है, उनसे वह वापस ले लीजिये। जब तक आपको नहीं लगता कि वह दोबारा ऐसा नहीं करेगा, खिलौना अपने पास ही रखिये, या किसी को दे दीजिये।जब वह उस खिलौने को गँवा देगा तब वह उसके लिए जरुरत बन जायेगा, हो सकता है वह आपसे वो खिलौना मांग ले इसलिए कुछ देर उसे अपने पास ही रखिये|

नोट: लेखक, योगराज पटेल, ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English version: http://www.gyankriti.com/blog/does-your-child-value-her-toys/

रचना सक्सेना द्वारा अनुवादित |

कल के दीप्तिमान बच्चों के लिए पाठ्यक्रम

जब हमने ज्ञानकृति कि स्थापना की थी तब हम हमारे विद्यर्थियों का ऐसा सर्वांगीण विकास चाहते थे जिसके द्वारा वे मर्मस्पर्शी भी हो और अपने मस्तिष्क का भी प्रयोग कर सके | इसके अलावा वे शैक्षणिक योग्यता के साथ साथ भावनात्मक ,शारीरिक ,सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास भी कर सके |हमने चाहा कि हमारा पाठ्यक्रम हमारे सम्माननीय सलाहकारों एवं प्रिय सहयोगियों के अनुसंधान का सार हो ।इस सबको सुचारु रूप से चलाने में internet का महती योगदान हैं जिसके द्वारा हमारी सभी शाखाओं पर स्थित प्राचार्यो एवं शिक्षिकाओं का काम आसान हो गया हैं ।यह सभी लोग अपने तमाम अनुभवों के साथ इस प्री-प्राइमरी पाठ्यक्रम को आकर्षक एवं उपयुक्त बनाने में जुट गए हैं |

हम चाहते हैं कि हमारा पाठ्यक्रम जिज्ञासु प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाला हो | इसका संपूर्ण प्रारूप निम्नलिखित प्रश्नों पर आधारित हैं जिन्होंने मुझे मेरे प्री-प्राइमरी के आधार कार्य एवं अनुसंधान के दौरान परेशान किया

1.एक १.५ से ६ साल के छोटे से बच्चे से हम क्या क्या सीखने की अपेक्षा करते हैं?

2.उनकी पढ़ाई में हाथ बटाने का सर्वोत्तम तरीका क्या हैं?

3.एक पालक एवं शिक्षक के तौरपर हम कैसे जान पाएंगे कि उन्होंने क्या क्या सीखा ?

कोई भी शैक्षणिक कार्यक्रम अपने वांछित परिणामों से सफल विद्यार्थियो की विशेषता बताने वाला होता हैं । हमारा पाठ्यक्रम भी निम्नलिखित उद्देश्यों पर आधारित हैं

* हमारे विद्यार्थी एक प्रश्नकर्ता हो जो अपनी पढ़ाई लिखाई के प्रति प्रेम का आनंद उठाये । इसके लिए एक शिक्षक कि भूमिका,उसकी जिज्ञासा को पोषित करने वाले की हो |

* हमारे विद्यार्थी दूसरों की भावनाओं और जरूरतों कि क़द्र करें । हमें उनमे सत्यनिष्ठा ,ईमानदारी ,निष्पक्षता एवं इन्साफ के बीज बोने का प्रयत्न करना चाहिए |

* वे शारीरिक शिक्षा के साथ साथ व्यक्तिगत कल्याण का महत्व भी समझे|

*वे आत्मविश्वास से एवं व्यग्र हुए बिना,किसी भी परिस्थिति का सामना कर सके |

*वे गणितीय चिन्हों के साथ साथ एक से अधिक भाषाओँ में अपनी कल्पनाओं को ग्रहण एवं व्यक्त कर सकें |

* वे ज्ञानकृतिमें वैश्विक प्रसंगों एवं उनकी अहमियत को खोजने में अपना समय व्यतीत करें |

यह सब करते हुए एक प्रीस्कूल जाने वाले बच्चे कि हैसियत से वे ज्ञान का अकूत भण्डार प्राप्त करेंगे| इसीलिए इस कार्यक्रम का मूलभूत आधार एक जिज्ञासु वृत्ति कि संरचना करना हैं ।हमारे शिक्षक, क्लासरूम एवं अन्य स्थानो पर उनकी जिज्ञासा को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं| अलगअलग कक्षाओं में अलगअलग विषय एवं विषय वस्तु का चयन किया गया हैं जैसे अक्षर ,वर्णमाला ,अंक ,प्रकृति ,समाज एवं त्यौहार इत्यादि ।समय पूर्व साक्षरता एवं गणितीय ज्ञान को परंपरागत तरीकों से सिखाया जा सकता हैं ।हमारे विद्यार्थी सामाजिक ,वैचारिक ,स्व प्रबंधन एवं सम्प्रेषण में प्रवीणता हासिल करने के लिए प्रयत्नशील होंगे|

हम हमेशा ही यही कहते हैं की हमारा पाठ्यक्रम एक प्रगतिशील कार्य हैं इसलिए ज्ञानकृति पाठ्यक्रमकी दृष्टी के प्रति आपके सुझावों का हम स्वागत करते हैं |

जल्द ही हमारी कुछ कल्पनाएँ और lesson-plans हम आपसे साझा करेंगे|

नोट: लेखक, योगराज पटेल, ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English Translation: http://www.gyankriti.com/blog/developing-curriculum-for-tomorrows-brightest-kids/

बचपन की देखभाल और शिक्षा – कोई बच्चों का खेल नहीं

“बचपन की देखभाल और शिक्षा के क्षेत्र में निवेश किया गया हर एक डॉलर बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक परिणाम पैदा करता है|” – प्रो जेम्स हेकमैन (अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता)

बचपन के पहले छ: वर्ष सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते है, क्योंकि इसी समय में मानसिक विकास सबसे तीव्र गति से होता है| इस समय के विकास में ना सिर्क स्वास्थय, पोषण और देखभाल की गुणवत्ता जरुरी है बल्कि साथ में दिए जाने वाले वातावरण का भी महत्त्व होता है| इस उम्र के अनुभवों का असर आने वाले कई वर्षो तक दिखाई देता है| जीवन के पहले तीन वर्षों को भाषा और शब्दावली के विकास में सबसे महत्वपूर्ण होते है| उच्च गुणवत्ता वाले ECCE (early childhood care and education) प्रोग्राम जिनमे बच्चों को भाषा सम्बंधित गतिविधियाँ करवाई जाती है, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में भी मदद करते हैं|

प्रारंभिक शिक्षा के कई लाभ होने के बावजूद आज भी हमारे देश में ऐसे शिक्षा संस्थानों की कमी है| भारतवर्ष में आज भी सिर्क १.१% शिशु प्रीस्कूल में दाखिला लेते है जबकि फ्रांस और स्कॉटलैंड जैसे देशों में यह संख्या १००% तक है| यही नहीं हमारे देश में प्रीस्कूल शिक्षण को लेकर अभी भी कोई तयशुदा मापदंड नहीं है| इन सभी बातों का असर प्रीस्कूल में दी जाने वाली सुविधों पर साफ़-साफ़ दिखाई देता है|

सन १९९६ में सर्वप्रथम NCERT ने निर्देशिका जारी की थी जिसमें ECCE के क्षेत्र में काम करने रहे संस्थओं के लिए न्यूनतम तय दिशा-निर्देश थे| उनमे से कुछ निर्देश इस प्रकार थे:

व्यापक पहलु विशिष्ट दिशानिर्देश
बुनियादी ढांचे एवं सुविधाएँ विद्यालय की भौगोलिक स्तिथि, खेलने के लिए स्थान, स्वचा शुद्ध पेयजल की उपलब्धता, प्रसाधन, सोने के लिए स्थान एवं भंडार गृह|
उपकरण और सामग्री बड़ी मांसपेशियों के विकास के लिए बाहरी उपकरण/ सामग्री, आंतरिक उपकरण/ सामग्री, प्राथमिक चिकित्सा किट
सुरक्षा एवं बचावन खेल-कूद वाले क्षेत्र की सुरक्षा, स्वतः बंद होने वाले दरवाज़े ना लगाना, बच्चों को नुकसानदेह  किसी भी वास्तु के लिए पृथक भंडारण व्यवस्था; जो उनके पहुच से दूर न हो, बच्चों से सम्बंधित सभी वस्तुओं का समय समय पर रखरखाव एवं नुकीली वस्तुओं के उपयोग पर रोक|
कर्मचारी कर्मचारियों की उपलब्धता, शिक्षक-छात्र अनुपात, कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता एवं तनख्वाह|
प्रवेश की उम्र प्रीस्कूल के लिए उपयुक्त कक्षानुसार उम्र को दर्शाता है
परवेश प्रक्रिया पुरानी प्रवेश प्रक्रियाओं के बजाय किसी दूसरी प्रक्रिया को अपनाना
प्रोग्राम समय, पाठ्यक्रम एवं पढ़ने का तरीका|
प्रलेखन प्रवेश रिकॉर्ड, प्रगति रिपोर्ट, टीचर्स डायरी, स्टाफ एवं छात्रों का उपस्थिति पत्रक, आय-व्यय, वस्तुओं का लेखाजोखा एवं कर्मचारियों से सम्बंधित जानकारी|

वर्तमान में ECCE  केन्द्रों के पाठ्यक्रम में कोई समानता नहीं है| प्रीस्कूल अपने केंद्र पर उपलब्ध सामान के आधार पर पाठ्यक्रम तय करते हैं| हालाँकि भारत सरकार द्वारा सुझाये गए “राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रुपरेखा” में प्रीस्कूल पाठ्यक्रमों के बारे में कहता है-

“इस उम्र में बच्चों में बड़ी तेजी से शारीरिक एवं मानसिक विकास होता हैं| इसी उम्र में बच्चें आत्म-निर्भर एवं उत्सुक नज़र आते है| जैसे जैसे उनका उनका शारीरिक विकास होता है वे सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से विकसित और परिपक्व होते जाते है| वे बहुत जल्दी अपने वातावरण में घुल-मिल जाते है और धीरे-धीरे अपनी कल्पनाशीलता के द्वारा भूतकाल एवं वर्तमान में आये अनुभवों को संजोने का प्रयास करते है| खेल-खेल में बच्चों का सर्वंगीण विकास होता है जिसके लिए एकदम सरल एवं बार-बार दोहराई जाने वाले हाव-भाव, जिसमे किसी वास्तु का समावेश भी सम्मिलित हो सकता है| इस उम्र में ही भाषा का विकास होता है, संकेतों की भाषा समझ में आने लगती है| इसी उम्र में अहंकार भी जागृत होता है जिसके द्वारा दो लोगो के विचारों की असमानता भी बच्चों को समझ में आती है| इसी समय में बच्चें कल्पनालोक में भी विचरण करते है| शारीरिक क्षमता, वैचारिक परिपक्वता एवं उचित सामाजिक विन्यास के लिए आवश्यक विस्वास, आदतें एवं रवैया तैयार होने के लिए प्रीस्कूल का समय सबसे प्रभावशाली एवं उचित होता है| सभी प्रीस्कूल चलने वालों कू इस बात की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए अपने पाठ्यक्रम की रचना करना चाहिए ताकि इन कक्षाओं में पढने के इच्छुक बच्चों का समग्र विकास सुनिश्चित किया जा सके|”

भारत सरकार ने लम्बे और उपेक्षापूर्ण रवैये के बाद अंतत: प्रीस्कूल नीतियों की तरफ ध्यान दिया है| ECCE नीति का लक्ष्य गली-मोहल्लों में तेजी से खुल रहे झूलाघर, प्रीस्कूलों जिनका कोई शैक्षणिक स्तर नहीं है उनका सुधार करना है| केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा तैयार नीति के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित है:

१) सभी बच्चों को सम्मिलित करने हेतु अनुकूलन कार्यनीति

२) पाठ्यक्रम की गुणवत्ता एवं स्तर

३) समुचित विकास सुनिश्चित करने के लिए समाज एवं परिवार को समाविष्ट करना

४) व्यवसायिकता को बढ़ावा देना

५) बच्चों के व्यवस्थित विकास एवं सुरक्षा को बढ़ावा देना

हम उम्मीद करते है की जल्द ही एक राष्ट्रीय परिषद् का गठन होगा को प्रीस्कूल और झूलाघरों में शैक्षणिक मानकीकरण, प्रशिक्षित शिक्षक, स्वछता एवं स्वास्थ्या पर दिशानिर्देश निर्धारित करेगा| कुछ प्रस्तावित दिशानिर्देश निम्नानुसार है-

१) ३-४ घंटे पढाई

२) ३० बच्चों की कक्षा के लिए कम से कम ३५ वर्ग मीटर का कमरा

३) न्युन्यतम ३० वर्ग मीटर का खुला बाहरी इलाका|

४) सुरक्षित भवन

५) सुगम, स्वच्छ एवं हरा-भरा क्षेत्र

६) स्वच्छ शुद्ध पेयजल

७) प्राथमिक उपचार सुविधा

८) शिक्षण सहायक सामग्री

९) भोजन एवं सोने के समय का नियंत्रण

१०) ३ से ६ वर्ष के बच्चों के लिए बालक-शिक्षक अनुपात २०:१ तथा ३ वर्ष से कम आयु वर्ग से लिए १०:१ हो|

‘ज्ञानकृति’ ने “प्रीस्कूल चले हम” अभियान आरम्भ किया है जिसके द्वारा उच्चस्तरीय प्रारंभिक शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने का प्रयास किया जा रहा है| विभिन्न अभियानों के माध्यम से हम अपने अभियान को बढ़ावा दे रहे है|

नोट: लेखक, योगराज पटेल, ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English Translation: http://www.gyankriti.com/blog/early-childhood-care-and-education-no-childs-play-2/