‘बच्चों का खाना’ बनाम ‘बड़ों का खाना’

जब मैंने २०१३ में ज्ञानकृति की स्थापना की थी उस समय यह कल्पना भी नहीं की थी कि पालकों के साथ मुझे साल में कई बार बच्चों के खाने (या नहीं खाने) के बारे में ईमेल या व्यक्तिगत मुलाकात करनी पड़ेगी प्रायः वास्तविकता आपकी कल्पना को तितर-बितर कर देते है। अपने बचपन में दूसरों का टिफ़िन चोरी करके खाने की तो खूब किस्से-कहानियाँ सुनी थी पर अचानक इस पीढ़ी को क्या हो गया विधाता? क्या ब्रम्हा ने आजकल के बच्चे किसी “manufacturing defect” के साथ बनाना चालू कर दिए है? विषय तो बहुत चिंतनीय है, इसलिए ‘बच्चो को आसानी से खाना खिलाने’ की इस श्रंखला की यह पहली कड़ी है…

आपके बच्चे को क्या खाना सबसे अधिक पसंद है? आँख बंद करके सोचिये…

क्या आपके दिमाग में हॉट डॉग, मैक्रोनी, चीज़ पिज़्ज़ा, बर्गर, मैगी जैसी तस्वीरें आई? कुछ लोग इस तरह के खाने को “बच्चों का खाना” भी बोलते है। अब तो आपको यह ब्लॉग और भी ध्यान से पढ़ना चाहिए।

बच्चों को इस तरह का खाना अधिक मात्रा में खाने के लिए कोई पौष्टिक कारण है क्या? या कोई कारण है कि बच्चे लौकी जैसे “बड़ों का खाना” नहीं खाये? संभव है कि आपने कभी “बड़ों का खाना” जैसा कुछ होता है यह न सुना हो, पर आपके बच्चे मन ही मन ऐसा निश्चितरूप से सोचते है। मैंने कुछ बच्चों को यह बोलते हुए भी सुना है कि “जब में बड़ा हो जाऊँगा तब मैं xyz सब्जी खाऊँगा।”

मेरी समझ के अनुसार अधिकतर बच्चे निम्नलिखित खाद्य पदार्थों के लिए कभी मना नहीं करेंगे

  • किसी भी तरह का जंक फ़ूड, जो एक डब्बे में बंद होकर आता हो
  • चॉकलेट युक्त खाद्य जैसे chocos आदि
  • केक, आइस-क्रीम के नाम पर कुछ भी

हर जन्मदिन पार्टी के बाद बच्चे यह सब खाकर आते है और पूरे स्कूल में सबको बड़ी शान के साथ बता रहे होते है आजकल बाहर खाने जाओ तो मेनू में “Kids Menu” अलग से दिए होते है, उनमे बच्चों के खाने के नाम पर यही सब कचरा (junk) परोसा जाता है

यह सिद्धांत कि बच्चों का खाना अलग होता है और बड़ों का खाना अलग, यही हमारे बच्चों को बिगाड़ रहा है।

पालकों को क्या करना चाहिये?

  • पसंद-नापसंद तो सबकी होती ही है, किन्तु खाने को लेकर घर को अलग-अलग टीम में ना बाँट दे
  • बच्चों को वही खाने के लिए प्रेरित करें जो आप खाते है (अगर आप भी ‘बच्चों वाला खाना’ ज्यादा पसंद करते है तो सुधार की शुरुआत स्वयं से करें)
  • ‘स्वाद’ के स्थान पर ‘पौष्टिक’ भोजन के बारे में बार-बार बच्चों को बताये
  • “बच्चों को तो यही सब पसंद है” आदि कहना बंद करें
  • “कभी-कभी चलता है” से काम नहीं चलेगा, हर दिन और हर परिस्थिति में पौष्टिक खाने की आदत डालनी होगी
  • डॉक्टर, शिक्षक (सर, मैडम) के नाम पर डराकर भी आदत सुधारने की कोशिश व्यर्थ ही जाएगी, बच्चा आपका है और कायदे से उसे आपकी बात सुनकर मानने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए बच्चा अगर आपकी बात नहीं मानता तो पहले आप ‘बात मनवाने के तरीके’ सीखें (Hint: Circle Time 5:00 onwards in this video https://www.youtube.com/watch?v=u0L1mnW7EpY )
  • अंतिम और सबसे महत्त्वपूर्ण उपदेश – बच्चे आपने आसपास के लोगो का ही प्रतिबिम्ब होते है स्कूल के शिक्षक, माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, भाई-बहन सबको आदर्श बनकर दिखाना होगा

यदि आपको मेरे विचार उचित लगे हो तो इस ब्लॉग या फेसबुक पर कमेंट करके या मुझे  yograj@gyankriti.com पर ईमेल करके अवश्य बताये आप खाने (या अन्य किसी विषय) से जुड़ी समस्या के बारे में जानना चाहते है तो वह भी लिखें, मैं भविष्य के ब्लॉग / विडियो में आप सभी के प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयत्न करूँगा धन्यवाद

One thought on “‘बच्चों का खाना’ बनाम ‘बड़ों का खाना’

  1. Ritu patidar

    Thanks sir for providing your excellent guidence regarding childs behaviour v/s parents responcibility in all scence.

    Reply

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