Guidelines for PTC – पीटीसी के लिए दिशा-निर्देश

What are parent-teacher conferences (PTC)? अभिभावक-शिक्षक सम्मेलन (PTC) क्या हैं?
Parent-teacher conferences are short (10 -15 Minutes) one to one session between parent and teacher that are formally arranged by the school twice in a year usually on Saturday. The PTCs are a valuable tool to help a parent and  child’s teacher(s) work together for child’s success. This is a great  opportunity for parents to ask questions and gather information that  will help them to encourage their children to achieve success. Common agenda points to discuss in PTCs will include going through the important achievements, goals set, issues with academics or behavior etc.

अभिभावक शिक्षक सम्मेलन आम तौर पर वर्ष में दो बार प्रायः शनिवार को आयोजित किये जाते हैं, जिसमे माता-पिता और शिक्षक के बीच १०-१५ मिनट के छोटे सत्र होते है। यह सम्मेलन बच्चे की सफलता के लिए अभिभावक व् शिक्षक को साथ में कार्य करने में एक मददगार साधन है। अभिभावकों के लिए यह एक अच्छा अवसर है जब वे अपने प्रश्न पूछ सकते हैं और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं जिससे वे अपने बच्चे को सफलता के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। सम्मेलन में चर्चा की सामान्य कार्यसूची में सम्मिलित बिंदु इस प्रकार हैं, प्रमुख उपलब्धियां, नियत लक्ष्य, अकादमिक गतिविधियों से सम्बंधित प्रश्न और व्यवहार इत्यादि।

How parent-teacher conferences are conducted? अभिभावक-शिक्षक सम्मेलन कैसे संचालित की जाती हैं?
Parents are informed at the starting of the session through a circular about the frequency of the PTCs during the year. The PTCs are generally conducted in the classroom. Different time slots have been allotted to the parents according to set time limit and number of students in the class.

सत्र के आरम्भ में अभिभावकों को सम्मेलन की आवृत्ति के बारे में सूचना दे दी जाती है। सम्मेलन आमतौर पर कक्षा में आयोजित किये जाते हैं। अभिभावकों को कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या के अनुसार निर्धारित समय आवंटित कर दिया गया है।

Why the PTCs are important? अभिभावक-शिक्षक सम्मेलन क्यों आवश्यक है?

It is very important to have good relationships between parents and teacher because the goals for the child are indeed shared goals; both teacher and parent want what is best for the child/student. By conducting these sessions with parents Teacher gets opportunity to
discuss the child’s learning progress and by attending, parents can show that they are interested and prepared to participate in and support their child’s learning.

The PTC will give you feedback on your child’s performance and progress.Also it is chance for parents to find out how their child is getting along in school and what is going on inside the classroom. Since the parents are considered as primary educator, they can contribute a lot to the discussions and decisions of their child’s progress.

अभिभावक व् शिक्षक के बीच अच्छे सम्बन्ध होना अत्यंत आवश्यक है क्योकि बच्चों के लक्ष्य बंटे हुए लक्ष्य हैं। अभिभावक व् शिक्षक दोनों ही बच्चे के लिए सर्वश्रेष्ठ चाहते हैं। अभिभावकों के साथ ऐसे सत्र आयोजित करने से शिक्षकों को अवसर मिलता है कि वे बच्चे के विकास के बारे में चर्चा कर सकें, और उपस्थित होने से अभिभावक भी यह दर्शा सकते हैं कि बच्चे के विकास में वे रूचि लेते हैं।

सम्मेलन में आपको आपके बच्चे के प्रदर्शन और विकास के बारे में जानकारी दी जाएगी। साथ ही अभिभावकों के लिए यह जानने का अवसर है कि उनका बच्चा विद्यालय में कैसा प्रदर्शन कर रहा है और कक्षा के अंदर क्या चल रहा है। चूंकि अभिभावक प्राथमिक शिक्षाविद माने जाते हैं, वे बच्चों की चर्चा व् निर्णय में योगदान दे सकते हैं।

Dos and Don’ts for Parents अभिभावक सम्मेलन में क्या करें और क्या न करें

1. Do attend the PTCs in the slots been given to you unless there is an emergency.
2. Both the parents will have to be present for the PTC.
3. In case you are late, you will not be able to get the allotted time with the teacher.
4. Please respect the privacy of the meeting.If a meeting is in progress or the teacher is busy, do not walk into the class. The teacher will call you in when she is ready to meet you.
5. Please bring the file with previous worksheets, pitara and any other documents as per the list sent to you.
6. Be prepared with questions that you want to ask at the conference to save time i.e. if you want specific feedback on maths or you wanted to discuss your child’s social skills etc.
7. Share information which you think is important for a teacher to know.
8. Be open to suggestions from the teacher.
9. If you wish to leave any comments/ give any feedback for the meeting, please fill in the Parents Feedback Form after PTC is over.

1. Please switch off your mobile phones before you enter in the classroom for the meeting.
2. Do not interrupt the teacher in between the meeting.
3. Do not exceed your allocated time limit.
4. Do not defend your child if teacher has mentioned any specific issue.
5. Do not lose control over emotions.Try to stay calm and focused on what will help the child the most.
6. Do not stray from the topic.
7. Do not discuss about the other child or the other teacher.

क्या करें :
1. यदि कोई आपात स्थिति न हो तो सम्मेलन में निर्धारित समय में ही उपस्थित हों।
2. माता- पिता दोनों की उपस्थिति अनिवार्य है।
3. यदि आपको विलम्ब हुआ, तो आबंटित किया हुआ १० मिनट का समय आपको प्रदान नहीं किया जा सकेगा।
4. कृपया सम्मेलन की गोपनीयता बनायें रखें। यदि सम्मेलन चल रहा है या शिक्षक व्यस्त हैं, तो कक्षा में ना जाएँ। जब भी शिक्षक आपसे मिलने के लिए तैयार होंगे वो आपको अंदर बुलाएँगे।
5. कृपया फाइल के साथ पुरानी वर्कशीट, पिटारा और सूची में लिखित अन्य दस्तावेजों को भी लाएं।
6. समय बचाने के लिए अपने प्रश्नों को तैयार करके आएं जैसे यदि आप गणित में कोई विशेष प्रतिपुष्टि चाहते हैं या बच्चे के सामाजिक कौशल के बारे में चर्चा करना हैं इत्यादि।
7. ऐसी जानकारी साझा करें जो आप चाहते हैं कि शिक्षक का जानना महत्वपूर्ण है।
8. शिक्षक के सुझावों को गलत नजरिये से ना देखें
9. यदि आप सम्मेलन के लिए किसी तरह की टिप्पणी करना चाहें या कोई सुझाव देना चाहें तो सम्मलेन के उपरान्त कृपया अभिभावक प्रतिपुष्टि फार्म को भरें।

क्या ना करें
1. सम्मेलन के लिए कक्षा में प्रवेश करने से पहले कृपया अपना मोबाइल फ़ोन बंद कर लें।
2. सम्मेलन के बीच में शिक्षक को हस्तक्षेप ना करें।
3. निर्धारित समय में ही बैठक समाप्त करने की कोशिश करें।
4. यदि शिक्षक कोई समस्या का उल्लेख करती हैं तो अपने बच्चे का बचाव ना करें।
5. भावुक होकर अपना संयम ना खोएं। शांत रहें व् जो बच्चे के भले के लिए है उसी पर केंद्रित रहें।
6. विषय से भटके नहीं।
7. किसी अन्य बच्चे या शिक्षक के बारे में बात ना करें।

Postponement of PTC Slot सम्मेलन के समय का पुनर्निर्धारण:

Rationale: At times there are requests from parents to change the slot because of:

– Engaged in some other work which is unavoidable.
– Out of town for some work etc.

The motto of the school is to address genuine  requests made by parents for the change in PTC slots other than slots fixed from school side.

औचित्य: कभी कभी निन्मलिखित कारणों से अभिभावक समय बदलने के लिए निवेदन करते हैं :

-किसी ऐसे कार्य में व्यस्त हो जाना जिसे टाला ना जा सके।
-किसी कार्यवश शहर से बाहर होना इत्यादि.

विद्यालय का सिद्धांत है कि नियत किये गए समय के अलावा कोई और समय के यथार्थ निवेदनों पर ध्यान देना।

Guidelines for Postponement of PTC Slot सम्मेलन के समय के पुनर्निर्धारण के लिए मार्गदर्शन ::

-If there is any genuine case or emergency then only a parent can ask for a change in PTC slot.
-For any change in date (not in time slot), parent  need to send the request by email or through letter, addressed to the Gyankriti Head Office ( )  at least 7 days in advance, unless it’s an emergency.
-The reasons for the postponement must be mentioned in the notification to check whether the reason is genuine or not.
-If the reason is found genuine, HO will approve the same and send it to the teacher for further processing.
-The teacher then will find a mutually convenient slot before or after the regular PTC date and will inform the parent about the confirmed date and time for the meeting through diary note.
-यदि कोई यथार्थ समस्या या आपात स्थिति हो तभी अभिभावक समय बदलने के लिए कह सकते हैं।
-आपात स्थिति में तारीख में बदलाव के लिए अभिभावक को ई-मेल ( ) या पत्र के माध्यम से कम से कम ७ दिन पहले मुख्यालय में निवेदन करना होगा।
-पुनर्निर्धारण के कारण का उल्लेख सूचना में अवश्य करें ताकि हम देख सकें कि कारण यथार्थ है या नहीं।
-यदि कारण यथार्थ है तो मुख्यालय उसे स्वीकृति देगा और आगे की प्रक्रिया के लिए उसे शिक्षक को भेजा जायेगा।
-शिक्षक सम्मेलन की तारीख के पहले या बाद का कोई उपुक्त समय निकाल कर अभिभावक को सूचित करेंगी
-यदि कारण यथार्थ है तो मुख्यालय उसे स्वीकृति देगा और आगे की प्रक्रिया के लिए उसे शिक्षक को भेजा जायेगा।
-शिक्षक सम्मेलन की तारीख के पहले या बाद का कोई उपुक्त समय निकाल कर अभिभावक को सूचित करेंगी।

Modern Nationalism: Mopping the floor

Recently I came across a viral Facebook post, it narrated the scene at a coffee shop:

So I am sitting at Starbucks yesterday and this group of three executives comes in.
They grab a table which a customer had just vacated.
It was slightly messy with a plate and a cup on it.
These three scream for the staff to clean it and complain loudly about the falling standards of cleanliness. (“Saala Starbucks Bhi KFC ban gaya hai. Itni gandh!”)
They leave about forty minutes later.
Leaving an even bigger mess on the table with plastic cups and bits of pastry.
A young lady takes the table.
She looks like a student and I think she is from Japan because her cap has the Rising Sun on it.
She picks up the plastic cups and throws them into a dustbin.
She then goes over to the counter, takes some tissues and starts cleaning the table.
Some of the staff notice
And run over to her and say that she should not bother. They will clean the table.
She answers:
“No, it is all right. It is my table, no?”

A massive lesson there.

The topmost comment on the post was even better. Why are we Indians like that?

A lesson should be learnt for sure, but the problem is in how we grew up looking at the system. Starting from we being a kid, every time we mad a mess, there was somebody to clean in be it mom or a house maid. I guess not everybody has been taught to even fix our bed after we get up. We need to start from there.

At Gyankriti we believe that teaching Practical Life Skills and Survival Skills along with regular academics is the most important responsibility of any school. Our preschool toddlers are trained to do basic age appropriate skills on their own, it may be buttoning, lacing, dusting or cleaning the floor after eating.

Yeah!! Cleaning and mopping the floor, for toddlers. Isn’t that bit extreme? No, it is not. In fact the children enjoy these activities and repeat on their own at home. There begins the problem because of our conditioned mindset. Some parents don’t like the fact that children are doing these activities at the school. This isn’t something “people like us” are supposed to do, it is the “maid’s job” after all. I am really disheartened when I get these kind of feedbacks from the “young, educated, middle class” audience we serve. School children in Japan clean the school toilets on their own. We don’t even know the name of aaya who cleaned the toilets of our school/office.

At the same time I would like to appreciate a vast majority of our parent community who love these kind of activities and encourage their children. Nationalism in modern time is not about wars or movements. It makes more sense to put efforts in bringing up our children in a way that they make our country proud in the way, the Japanese girl did. PM Narendra Modi started a fantastic Swacch Bharat mission after last year’s Independence Day speech, its success solely depends on our responsible behaviour. Let’s stop saying “यह मेरा काम नहीं है” or “यह काम मेरे level का नहीं है” for a better India.

Happy Independence Day.

जय हिन्द!

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

Reproduced from original post on Linkedin:

Homework in preschool?

Did you know that homework can be, and often is, sent home for preschoolers? Do you think this is reasonable, or are you wondering whether this is even a good idea? You’re not alone, in either case, even I am getting various suggestions from parents and teachers regarding homework. As a policy we have never given homework to children but we are definitely ready to debate and discuss this issue raised by parent-teacher community.

photoI knew our child would eventually bring homework home, but I never expected it to happen at the preschool level. However, our parents and teachers report that homework in preschool is definitely happening. Is this completely crazy, or does it set a child up with a solid foundation as she goes through the rest of her school years?

Setting a foundation

Many parents we talked to felt that, within reason, homework at the preschool age helps set an important foundation. The type of homework sent home at this age varies from school to school, but most don’t make it overwhelming for the child and her parents. Often the tasks are simple, such as tracing a letter or practice writing their name. “I think it’s totally reasonable,” shares one of the parent. “It starts the homework habit early and gets the parents involved. Also, it helps the parents to know what they are learning during the day so they can reinforce it at home.”

“Nuha gets little homework assignments and I think it’s fun and involves us at home in her projects at school,” explains one of our teacher. “Usually it involves her cutting pictures out of a magazine for their colour books or bringing in something, like leaves. I think it sets them up to know that someone from home can help them with their work.”

Different types of homework

Some moms feel that regular, daily “busy work” homework is unnecessary for this age — but little projects every now and then are not only a good idea, but they can be lots of fun, too. “Simran’s KG class had ‘homework’ once,” says one of our parent. “They were told to learn the name and qualities of vegetables cooked at home everyday and share it the class next day. That kind of stuff gets parents involved, which I like. If she was sent home with pages of actual work I’d be a little upset — it’s not necessary.”

Another parent, thought the idea was, as she put it, stupid. “I think that’s unfair to the parents and disrespectful of everything else that is going on in people’s lives,” she says. Being involved in your child’s education starts from the day they are born, and it doesn’t stop when they go to school. Parent involvement is critical when it comes to your child’s success, and although preschool can seem like glorified day care, it really isn’t. Your kiddo is learning important social skills, classroom structure and how to be a good student — in addition to beginner academics. Having — and continuing to have — an interest in her schooling is a good habit for parents to get into. This also helps you be prepared to support your child throughout her education.

That being said, the parents we spoke to were about half and half on the necessity of homework for children this small. Being involved doesn’t have to mean helping your child with homework every day, especially for a 2 or 3-year-old who just wants to come home and play with blocks.

How do you feel? There’s a long-running debate on the benefits of homework. The purpose of homework is to bridge the gap between children’s learning at school and at home, but just how relevant is it to the modern generation? Let us know in the comments.

In my honest opinion, as shared in our previous blog, homework should be set at such a level that children can do with little or no help of the parents/elders at home. Is it possible at this age, probably not. Then what should we do? I have an answer for that too but I would like to read your suggestions first.

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

Home-work or Parent’s work?

One evening my 9 yrs old nephew came to me asking to help him out in his homework. When I saw his assignment I was surprised, it was four pages long story and his task was to shorten it. Wow! I didn’t get this kind of task even in high school. Then I thought educators might have taught him in class. When I asked him to read out story and explain, I was shocked he was able to read it with some wrong pronunciations but unable to explain even a single line. I tried to explain him each line but finally gave up because I realized that, firstly that assignment was not meant for his standard, and secondly school is not preparing him to learn and explore, he is being prepared only for exams. Assignments given by teachers are actually not for students but it is a task of parents. And parents always want their kids’ assignment to be best in the class so they also get involved in it. After all they have to compete with “Sharma ji’s son”.


Assignment is just not writing work. Assignment is learning.

I still remember when I was in school, for me assignment was just to note down classwork in another notebook, what we called ‘Fair Copy’. It didn’t really help in learning or exploring something new but at least this way whatever was taught in class was being revised at home and secondly parents didn’t bother to be a part of it. In my opinion for senior students assignment should be of their level, which they can complete by themselves, without getting any help from parents or tutors.

For preschoolers assignment should not be given from school side. Instead of that preschools can provide some sort of information handout every month (like we do in the form of Gyankriti Pitara), so that parents can revise those topics at home. On the other hand parents also have to understand that toddlers have limited attention span, so instead of forcing kids to revise at a particular time, they can make learning a part of their routine. E.g. When they want to revise fruits, they can actually take their kids’ to mall and ask them names of fruits. Or can be revised at home also.

Parent involvement is helpful but we should always keep in mind that trained and experienced tutors have different style of teaching which can’t be imitated by parents. Similarly we discourage parents to send their children to tuition classes (Yes! Some parents send preschoolers to tuition). We at Gyankriti believe that parents play an important role in the learning process of their children. Not allowing tuitions ensures that parents take interest and participate in the academics of children. Continuous parental support goes a long way in enhancing academic and co-curricular performance.

Note: The author is administrative head of Gyankriti, Sudarshan Nagar branch. The views expressed here are personal.

एक शाम मेरा ९ वर्षीय भांजा मेरे पास आया और उसने मुझे उसके गृहकार्य में मदद के लिए कहा। जब मैंने उसका कार्यभार देखा तो आश्चयचकित हो गयी, वह एक ४ पन्नों की लम्बी कहानी थी जिसे उसे छोटी बनाना था। वाह! इस तरह का गृहकार्य मुझे कभी उच्च विद्यालय में भी नहीं मिला था। फिर मुझे लगा कि सम्भवतः उसे शिक्षकों ने कक्षा में सिखाया होगा। जब मैंने उसे वो कहानी पढ़ने और समझाने के लिए कहा, मैं चकित हो गई वह उस कहानी को कुछ टूटे फूटे उच्चारण के साथ पढ़ तो रहा था पर उसकी एक भी पंक्ति समझ नहीं पा रहा था। मैंने उसे हर पंक्ति का मतलब समझने की कोशिश की पर हार गई क्योकि मुझे अहसास हुआ कि, पहली बात वो कार्यभार उसकी उम्र के लिए बहुत कठिन था, और दूसरी बात कि विद्यालय उसे सीखने और खोजने के लिए नहीं अपितु केवल परीक्षा के लिए तैयार कर रहा है। शिक्षकों द्वारा दिया गया गृहकार्य असल में विद्यार्थियों के लिए नहीं अपितु अभिभावकों के लिए होता है। और अभिभावक हमेशा चाहते हैं कि उनके बच्चे का कार्य सबसे अच्छा हो इसलिए वो भी उसका हिस्सा बन जाते हैं। अंत में उन्हें “शर्मा जी के बेटे” के साथ बराबरी जो करना है।

मुझे अभी भी याद है जब मैं विद्यार्थी थी, मेरे लिए कार्यभार होता था कक्षा में कराये गए कार्य को दूसरी कॉपी, जिसे हम ‘फेयर कॉपी’ कहते थे, में लिखना। असल में ऐसा करने से कुछ नया सीखने या खोजने में कोई मदद नहीं होती थी, पर कम से कम कक्षा में जो पढ़ाया गया है उसकी पुनरावृत्ति हो जाती थी, और इसके हम अभिभावकों को इसका हिस्सा भी नहीं बनाते थे।

मेरा मत है कि विद्यार्थियों को गृहकार्य उनके स्तर का देना चाहिए, जो वे बिना अभिभावक या ट्यूटर की मदद के स्वयं कर सकें। प्रीस्कूल विद्यार्थियों को विद्यालय की ओर से गृहकार्य नहीं देना चाहिए। इसके स्थान पर प्रीस्कूल हर माह स्कूल में होने वाली गतिविधियों की जानकारी दे सकते हैं (जैसे हम ज्ञानकृति पिटारा देते हैं), ताकि अभिभावक उन विषयों की पुनरावृत्ति घर पर करवा सके।

दूसरी ओर अभिभावक को यह भी समझना होगा कि बच्चों में एकाग्रता बहुत सिमित होती है, इसलिए उन्हें किसी नियत समय पर बलपूर्वक पढ़ाने के बजाये, पढ़ाई उनकी दिनचर्या का हिस्सा बना दें। उदहारण के लिए यदि वे ‘फल’ की पुनरावृत्ति करना चाहते हैं तो बच्चों को मॉल ले जाकर फलों के नाम पूछ सकते हैं, या घर पर भी इसी प्रकार सिखा सकते हैं।

अभिभावकों की सहभागिता मददगार है, किन्तु हमे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्रशिक्षित और अनुभवी शिक्षकों का पढ़ाने का तरीका अलग होता है, जिसका अनुकरण अभिभावक नहीं कर सकते। इसी तरह हम उन अभिभावकों से भी असमर्थ हैं जो अपने बच्चों को कोचिंग क्लासेस भेजते हैं (हाँ! कुछ अभिभावक प्रीस्कूल के बच्चों को भी ट्यूशन भेजते हैं)। ज्ञानकृति का मत है कि बच्चों की पढ़ाई में माता पिता का योगदान महत्वपूर्ण है। ट्यूशन नहीं भेजना यह दर्शाता है कि बच्चों की पढ़ाई में माता पिता रूचि लेते हैं और उसका हिस्सा बनते हैं। अभिभावकों की लगातार सहायता बच्चों की अकादमिक और गैर-अकादमिक प्रदर्शन को बढ़ावा देता है।

नोट: लेखक ज्ञानकृति सुदर्शन नगर शाखा की प्रशासनिक प्रमुख हैं| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

Handling a fussy eater | खाने की आदतो के बारे मे कुछ सुझाव


Many parents have complained/informed about eating habits of their children. Here are some suggestion:

Handling a fussy eater
A fussy eater is no freak. Fussy eating is perfectly normal, especially for children. As children experiment with food, they develop preferences just like adults. The solution is to offer a wider variety of foods so that they are more likely to choose favourites across food groups. Variety also provides different vitamins and minerals. Don’t stress out if your child refuses to eat bananas. Just look for other foods which contain similar nutrients.

Try to improve your child’s appetite by increasing her physical activity. A hungry child is less likely to be fussy about food. Health drinks and vitamin supplements are not the only solution for fussy eaters. Try to meet your child’s nutritional needs as you would meet your own.

My son refuses to drink milk
“My son refuses to drink milk. It seems to me that all children readily accept milk- based beverages. But my 5-year-old son absolutely refuses to have milk with or without a nutritional supplement. I’m worried that he will lose out on vital nutrients.” – A concerned father

A balanced diet has the most ‘vital nutrients’. So if your child is getting a healthy mix of foods, with portions of staples, proteins and vegetables, you need not worry about his milk aversion. Dairy products are an important source of calcium and minerals, but can be found in milk products as well. Introduce him to curd, flavoured yoghurt, paneer, cheese and ice-cream which will provide him calcium. Other foods rich in calcium include leafy greens, almonds and dry fruits. Health drinks are good but not indispensable. Just focus on healthy eating habits, and don’t worry about the milk. You could reintroduce it after a few months. Alternatively, try flavoured milk. If your child develops a taste for it, you can slowly shift to flavoured health drinks. Try getting a friend, teacher or relative to convince your child to drink milk every day. Sometimes, children are more open to suggestions from people other than their parents.

कई अभिभावकों ने अपने बच्चों की खाने की आदतों के बारे में शिकायत/सूचना दी है।  यहाँ कुछ सुझाव हैं :

खाना खाने में नखरे करना एकदम सामान्य है, खासकर बच्चों के लिए।  क्योकि बच्चे भोजन के साथ प्रयोग करते हैं, वे अपनी पसंद बनाने लगते हैं  बिलकुल बड़ों की तरह। समाधान यह है कि भोजन की व्यापक विविधता पेश की जाए ताकि उन्हें चयन करने के लिए अधिक संभावनाएं प्राप्त हो।  विविधता से उन्हें भिन्न भिन्न प्रकार के विटामिन व खनिज भी मिलते हैं।यदि आपका बच्चा केला खाने से मना करता है तो चिंता मत कीजिये।  उसे कुछ और दीजिये जिसमे सामान प्रकार के पौष्टिक तत्व हों।

बच्चे की भूख बढ़ाने के लिए उसकी शारीरिक गतिविधियों को बढ़ाएं।  अगर बच्चा भूखा होगा तो वह भोजन के लिए कम नखरे करेगा। कृत्रिम पेय पदार्थ और विटामिन के पूरक ही एकमात्र समाधान नहीं है।  अपने बच्चे के पोषण सम्बंधित जरूरतों को ऐसे ही पूरा कीजिये जैसे आप अपनी करते हैं।

मेरा बच्चा दूध पीने से मना करता है
“मेरा बेटा दूध पीने से मना करता है।  ऐसा लगता है कि सभी बच्चे दूध के उत्पादों को ख़ुशी से स्वीकारते हैं।  किन्तु मेरा ५ वर्षीय बेटा दूध बिलकुल नहीं पीता। वह सादा दूध या पौष्टिक पूरक मिला कर दोनों के लिए ही मना करता है।” – एक चिंतित पिता

एक संतुलित आहार में महत्वपूर्ण ‘पौष्टिक तत्व’ होते हैं।  तो यदि आपका बच्चा पौष्टिक भोजन, प्रोटीन और सब्जियां खा रहा है तो आपको दूध के बारे में चिंता करने की जरुरत नहीं है। डेयरी उत्पादों में महत्वपूर्ण केल्शियम और खनिज होते हैं, किन्तु वे दूध के उत्पादों में भी पाये जाते हैं।  उसे दही, फ्लेवर वाला मट्ठा, पनीर और आइस-क्रीम दीजिये, इनसे भी उसे कैल्शियम प्राप्त होगा।  अन्य कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थों में हरी पत्ते वाली सब्जियां, बादाम और सूखे मेवे सम्मिलित हैं।  हेल्थ पदार्थ अच्छे हैं किन्तु अनिवार्य नहीं हैं।  बस स्वस्थ खाने की आदतों पर ध्यान दीजिये, दूध की चिंता मत कीजिये।  आप उसे कुछ महीनों बाद वापस देने की कोशिश कर सकते हैं। एक विकल्प यह है कि फ्लेवर वाला दूध देने की कोशिश कीजिये।  यदि आपके बच्चे को वह  स्वाद अच्छा लग जाता है तो धीरे से फ्लेवर वाले हेल्थ ड्रिंक देना शुरू कर सकते हैं। उसे प्रतिदिन दूध पीने के लिए समझाने के लिए किसी दोस्त, शिक्षक या रिश्तेदार की मदद भी ले सकते हैं। कभी कभी बच्चे उनके माता-पिता से ज्यादा किसी और के सुझावों को सही मानते है|

रचना सक्सेना द्वारा हिंदी में अनुवाद किया गया|

नोट: लेखक ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

The importance of Play | बच्चों को खेलना क्यों चाहिए?

Why should children play?

Simply because play is the work of childhood. Play helps children learn better, retain learning and enjoy the process. Play teaches children to reason, use logic, plan, work with others, sometimes lead, sometimes follow, to win or lose and to shake hands and make up after a contest.

It’s important that children play with appropriate toys and have the option of indoor and outdoor play. Use of battery toys, computer games and video games should not qualify as play as they are harmful in several ways.

  1. Such toys set the agenda for a child. It’s not the child thinking or working out what to do next; it’s the toy that decides.
  2. They tend to reduce social interaction and make children anti-social.
  3. Reduced social interaction impairs the development of communication skills.
  4. Such toys/games can be very addictive.
  5. They could cause obesity, eye and other health problems.

Children have everything to gain when you give them the gift of play. Depriving children of play opportunities could have negative consequences – depression, aggression and hostility.

हिंदी अनुवाद

बच्चों को खेलना क्यों चाहिए? क्योकि खेलना बचपन का अभिन्न अंग है। खेलना बच्चों के सीखने की क्षमता को बढ़ाने, याद रखने और प्रक्रिया का आनंद लेने में मदद करता है। खेलने से बच्चे कई महत्वपूर्ण बातें सीखते हैं, जैसे कारणों को जानना, तर्क का उपयोग करना, योजना बनाना, अन्य लोगों के साथ काम करना, कभी नेतृत्व करना, कभी पालन करना, जीतना या हारना और हाथ मिलाना एवं प्रतियोगिता के बाद एक हो जाना।

यह बहुत महत्वपूर्ण है कि बच्चे उपयुक्त खिलौनों से खेलें एवं उनके पास घर के अंदर व् बाहर खेलने का विकल्प हो। बैटरी चलित खिलौनों का प्रयोग, कंप्यूटर गेम्स एवं वीडियो गेम्स खेल की श्रेणी में नहीं आना चाहिए  क्योकि वे बच्चों के लिए कई मायनों में हानिकारक हैं।

  1. ऐसे खिलौने बच्चों के लिए कार्यसूची बना देते हैं। इसमें बच्चे खुद से कुछ नहीं सोच रहे होते हैं, ना ही वे आगे की कार्यप्रणाली बनाते हैं, ये निर्णय खिलौने लेते हैं।
  2. वे सामाजिक संवाद कम करते हैं, व् बच्चों को असामाजिक बनाते हैं।
  3. सामाजिक संवाद की कमी बच्चों के संचार कौशल को बाधित करती है।
  4. ऐसे खिलौने/गेम्स बच्चों की लत बन सकते हैं।
  5. वे मोटापे, आँख व् अन्य स्वास्थ्य सम्बंधित परेशानियों का भी कारण बन सकते हैं।

जब आप बच्चों को खेलने की स्वतंत्रता देते हैं तो वे सब कुछ सीख लेते हैं। अवसाद, आक्रामकता और शत्रुता – खेलने के अवसरों से वंचित बच्चों के नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं।

रचना सक्सेना द्वारा हिंदी में अनुवाद किया गया|

नोट: लेखक ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.


“मुझे ये चाहिए, मैं कुछ नहीं जानता” – नखरों के राजकुमार

माता-पिता बनने के लिए किसी शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं होती और ना ही इससे यह पुष्टि होती है कि हम अपने बच्चों की मानसिक अवस्था को अच्छे से समझते हैं। जब भी बच्चों के व्यव्हार से जुडी कोई भी समस्या आती है हम सोचने लगते है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? अनेक समस्याओं में से एक है ”ध्यान आकर्षित करने हेतु ’नखरे’ करना”| मानव जाति अन्य प्रजातियों की तुलना में बच्चों को पालने में बहुत ज्यादा समय देती है; यह देश एवं क्षेत्र की परंपरा पर भी निर्भर करता है|  जिस क्षण शिशु माता पिता के पास आता है वह सबके आकर्षण का केंद्र बन जाता है।इसी के साथ रूठना,मनाना और प्यार करना शुरू हो जाता है| क्या हम बच्चों को खुद से खेलना सिखाते हैं? खुद के साथ रहना सिखाते हैं? जब तक शिशु 2 साल का होता है यह उसकी आदत बन जाती है। उनके लिए हम हमेशा उनके आसपास, उनके साथ होते हैं, उनकी असुरक्षा छुप जाती है और उनकी हर इच्छा पूरी होती है। उन्हें सामाजिक बनाने के लिए हम उनके साथ नकारात्मक व्यवहार करने लगते हैं, जैसे ‘ना’ कहना , ‘मत करो’, इत्यादि। हमारा यह बर्ताव उनके अन्दर एक अलग तरह की समस्या पैदा करता है, वे हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए गुस्सा करने लगते हैं।

इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए कुछ सुझाव हैं:

  1. स्वास्थ्य: सबसे पहले नब्ज़ देखें। देखिये कि बच्चों की ज़रूरतों का ध्यान रखा जा रहा हैं। कहिं वह भूखा, प्यासा, बीमार या थका हुआ तो नहीं है? यह सुनिश्चित करने के बाद अगले पड़ाव पर जाईये।
  2. नज़रंदाज़ कीजिये और बढ़ जाईये: यह बहुत अजीब लगता है जब हम इस बारे में सोचते हैं। “क्या यही रास्ता है?” पर विश्वास कीजिये यह काम करता है। यह पहला कदम है उनसे उनकी पहचान कराने का और हर समय ध्यान आकर्षित नहीं कराने का। ऐसा  करने से वे समझ जाते हैं “यह काम नहीं करेगा”। साथ ही इससे उन्हें समय मिलता है कि वे अपनी भावनाओं पर काम करें।
  3. बात टालने की कोशिश करे: यह तरीका जादुई है। जब वे हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं तब उनका ध्यान किसी और क्रिया की तरफ केन्द्रित कर दीजिये। कुछ और दिलचस्प दिखाईये, रहस्य साझा कीजिये, और गाना गाईये। मासूम विचारों को विचलित करना बहुत आसान है। भोला बने, नीचे गिर जाने का नाटक करें, उन्हें विचलित करने के लिए कुछ भी कीजिये। इसका अभ्यास कीजिये, यह बहुत आसान है।
  4. शांत रहिये, जैसा कि आप उम्मीद करते हैं: आप चाहते हैं कि बच्चा शांत रहे जबकि परिस्थितियां
    उसके अनुकूल नहीं होती हैं और वह गुस्सा करना चाहता है। यदि आप चिढने और चिल्लाने लगेंगे तो बच्चा शायद कभी नहीं समझ पायेगा। यदि हम भी उनके जैसे ही गुस्सा करने लगे तो हम उन्हें शांत रहना कैसे सिखायेंगे?
    हर तरह की परिस्थिति में शांत रहकर खुद को आदर्श साबित कीजिये। जब वे आपको आदर्श मानकर, शांत रहकर आपका प्रतिबिम्ब बने तब उन्हें प्यार करें  एवं उन्हें सराहें।
  5. हिम्मत न हारें: इसी कारणवश आपने  पहले “नहीं” कहने का निर्णय लिया था। अचानक, सिर्फ बच्चे के गुस्सा करने के बाद वो बात सही नहीं हो जाती। साथ ही, यदि आपने एक बार हार मान ली तो बच्चे को अपनी इच्छा पूरी कराने का नया तरीका मिल जाता है। इस बात का सदैव ध्यान रखे, यदि इससे बच्चे पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता तो शुरू में ही ”हाँ” कह दे; लेकिन एक बार ”नहीं” कहने के बाद अपना निर्णय ना बदले|
  6. गुदगुदी करना: यह तरीका बहुत प्रभावशाली है I मैंने खुद किया है।  जब भी मैं चाहती थी कि मेरा बेटा मेरी बात सुने और अनुपालन करे मैं उसे गुदगुदी करती थी। असल में यह एक जटिल स्थिति को सकारात्मक रुख पर ख़तम करता है| साथ ही इससे उनका परिचय हँसनें खिलखिलाने से होता है। हँसनें से तो आधी समस्या वैसे ही समाप्त हो जाती है |
  7. चिढ़ने का कारण समझिये: इसे पहचानिए , बच्चे को गुस्से के स्त्रोत से दूर कीजिये। उन्हें शांत रहने के लिए प्रोत्साहित करें, अगर वे ऐसा करते है तो उन्हें उनकी मर्ज़ी का कुछ अच्छा काम करने का वादा कीजिये। उन्हें कहिये कि अगर वे ऐसा करेंगे तो ताकतवर, बड़े व समझदार बनेंगे।. उनसे वादा कीजिये कि आप उन्हें कहानी सुनायेंगे, साथ समय व्यतीत करेंगे, उनके साथ खेलेंगे जो भी उन्हें अच्छा लगता है। अगर वे ऐसा करते हैं तो आप भी अपना वादा ज़रूर पूरा करें।
  8. साथ में समय व्यतीत करें: मात्र 5 मिनट का सकारात्मक समय उन्हें उनकी भावनाओ को हल करने व् आपका दृष्टिकोण समझने में बहुत मदद करेगा। केवल आप और आपका बच्चा बिना किसी अवरोध के, एक दूसरे से बात करे, उसे लाड-प्यार दे | यह आपके लिए भी बहुत आनंददायक क्षण होगा |

ये सभी सुझाव काम करते हैं। कभी ये तो कभी वो, पर काम जरुर करते है | उन्हें सिखाते-सिखाते हम भी बहुत कुछ सीख जाते है|

नोट: लेखिका, ऋतू सिंह, तुलसी नगर, इंदौर शाखा की प्रधानाध्यापिका हैं। उन्हें भारत व विदेश में शिक्षा के क्षेत्र में कई वर्षों का अनुभव है। यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English version:

रचना सक्सेना द्वारा अनुवादित |

बच्चों को खिलोनों का महत्त्व समझाये

“मेरी बेटी के पास बहुत सारे खिलौने हैं, किन्तु वह उनका महत्त्व नहीं समझती।”- विद्या गौर, जो एक सात साल की बच्ची की माँ हैं | विद्या खुद दो तीन खिलौनों के साथ बड़ी हुयी, और हर साल जन्मदिन पर एक नया खिलौना उनमे जुड़ जाता था ।आजकल के सुविधायुक्त जीवन में बच्चे टोकरी भर खिलौनों के साथ बड़े होते हैं, और बहुत मुश्किल है उन्हें यह समझाना कि भारत के 4 करोड़ 80 लाख में से अधिकतम बच्चों के लिए ये खिलौने कितने अनमोल हैं।

“मुझे कोई चिंता नहीं अगर मेरा खिलौना टूट जाता है, मुझे नया मिल जायेगा।” यह कहना है 6 साल के रिषभ वर्मा का। उसे नहीं पता कि उसके माता पिता को ऐसे कथन क्यों पसंद नहीं। रिषभ की ही तरह अनेक मध्यम वर्गीय बच्चे परवाह नहीं करते यदि उनके खिलौने गुम हो जाये या टूट जाये, क्योकि उन्हें पता है कि उन्हें दूसरे मिल जायेंगे।

यहाँ कुछ तरीके है जिससे बच्चों को वस्तुओं का महत्त्व समझाने में मदद होगी –

जरूरतमंद लोगों को बांटना

उनका ध्यान उन बच्चों की तरफ आकर्षित करें जो इन सुख सुविधाओं से वंचित हैं। समझाईये कि वे कम कपड़े व भोजन और बिना खिलौनों के साथ कैसे जीते हैं। अपने बच्चों से कहिये कि वे उन भोजन, कपड़े और खिलौनों के पैकेट बनाये जो उनके लिए पुराने हो गए हैं। उनकी पसंद आपसे अलग हो सकती है, किन्तु उन्हें स्वीकारने के लिए तैयार रहें।एक उपयुक्त परिवार को ढूंढे जिसे यह पैकेट दे सकें। ये परिवार निर्माण करने वाले मजदूर जो टेंट में रहते हैं या फिर आपके नौकर भी हो सकते हैं। हांलाकि बच्चों को यह समझाना भी आवश्यक है कि जब वे समाज के दूसरे तबके के लोगों से मिलें तो बहुत ज्यादा दया, घृणा या नम्रता न दिखाएँ। साथ में जाईये और उन्हें वो पैकेट दीजिये। चैरिटी करने से आपके बच्चे को एहसास होगा कि कम सुविधाओं वाले बच्चों के लिए ये कपड़े और खिलौने कितने मूल्यवान हैं और साथ ही उन्हें चैरिटी का सुखद अनुभव भी होगा।

नई चीजों की जांच करना

जन्मदिन पर ढेर सारे तोहफे मिल जाने पर कुछ तोहफे उतने आकर्षक नहीं लगते | इस्तेमाल करने से पहले अपने बच्चे को पहले हर नयी चीज़ को ध्यान से देखने दें।अगर वे कोई ऐसे खिलौने/गेम/पाठ्यसामग्री है जो बच्चे के पास पहले से है, या उसे उसकी आवश्यकता नहीं है, तो वह उसे एक बक्से में सम्हाल कर रख ले। ऐसे तोहफे किसी जरूरतमंद को दे सकते है, तोहफे के रूप में किसी और को दे सकते हैं या बाद में उपयोग में ले सकते हैं|

रीसायकल करना

पुराने खिलौने किसी दूकान या वेबसाइट पर बेचे भी जा सकते हैं। इस तरह बच्चे जागरूक होंगे कि उन चीज़ों को किसी को देकर या बेचकर कुछ समझदारी का कम कर रहे हैं बजाये के घर पर  बिना उपयोग में लाये पड़े हुए हैं। इसके बदले में उन्हें अनुमति दी जा सकती है कि उन्हें जिस चीज़ की आवश्यकता है वो खरीद सकते हैं।

उत्सुकता बढ़ाये

कोई भी नयी वस्तु उपहार में देने से पहले उसके बारे में बच्चे से बात करके या इन्टरनेट पर उससे सम्बंधित सामग्री दिखाकर दिलचस्पी बढ़ाये। एक बार उसकी जिज्ञासा प्रज्वलित हो गयी वो उस वस्तु का महत्त्व समझेगा।

अनुचित प्रयोग को नियंत्रित करें

यदि आपका बच्चा अपने खिलौनों को लेकर लापरवाह है, उन्हें फेंकता है या बिस्तर के नीचे धकेलता है, उनसे वह वापस ले लीजिये। जब तक आपको नहीं लगता कि वह दोबारा ऐसा नहीं करेगा, खिलौना अपने पास ही रखिये, या किसी को दे दीजिये।जब वह उस खिलौने को गँवा देगा तब वह उसके लिए जरुरत बन जायेगा, हो सकता है वह आपसे वो खिलौना मांग ले इसलिए कुछ देर उसे अपने पास ही रखिये|

नोट: लेखक, योगराज पटेल, ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English version:

रचना सक्सेना द्वारा अनुवादित |

“I AM HERE AND I WANT THIS” – Tantrum King

Becoming parents requires no degree; also it does not guarantee our understanding the psychology of the little ones. Sometimes we are so baffled when small pin like situations arise and we are in a fix. How to deal with this one? One among the many is

“Children seeking attention and throwing tantrums”

Humans have the longest relationship nourishing period; it stretches according to the culture of the country. The moment a child arrives to the parent, it becomes the centre of attraction for them. Then starts the fussing, loving and nurturing part. Do we also teach the children to play by themselves, to be with themselves? This turns into a habit by the time a child turns 2 years old. For them we are always around, we are always there, their insecurities are covered up and their desires fulfilled. In the process of readying them for the society, we start a reverse process of denials, saying no, don’t, afterwards. This initiates a different problem in child seeking our uninterrupted attention by throwing tantrum.

Here are some helpful tips to deal with this:

  1. Health: First and foremost check the vitals. See, if the child has his needs taken care of. Whether or not he is either, hungry, thirsty, sick or tired. Once this is done move to other steps of how to deal with it.
  2. Ignore and Walk away: It seems to be an awkward way when we think about it. “Is this the way? “But believe me it works. It is the first step to introduce them to their own selves and not to seek attention all the time. By doing this they come to know “This doesn’t work”. Also, it gives them time to work on their emotions.
  3. Avert / Act silly: This works wonders. Just distract them towards something else from their immediate focus of attention. Point out to something else, show them something interesting, tell them a secret, and sing them a song. Innocent minds can be distracted easily. Act silly, topple over, fall down, just anything to distract. Practice the trick and OH! It can be so much easier.
  4. Stay Calm as You Seek: Is this not what it is all about. You desire for the child to stay calm when the situation is making him/her to throw tantrum. Tell the child let’s reason it out later. If you start yelling and shouting, then the child may never be able to understand. What is this fuss all about as you are reciprocating in the same way? Be the role model in displaying the calm and coolness in all the adverse situations. Love them when they display themselves as the role modelled representations of your coolness and calmness.
  5. Don’t give In: After all this is why you took the first decision of saying “no”. Suddenly, after the tantrum it cannot become right. Also, once you give in the child has discovered a new way of getting his wish fulfilled. Be careful, either say yes at the start if it does not matter in the child’s development, but do not change your decision to “yes” once said no.
  6. Tickle: This works wonderfully well. I have tried. Every time I need my son to listen to me and comply I tickle. It actually ends a complex situation on a positive note. Also, who can resist tickling? It also introduces them to laughter and smiles. And hormone to help them to do so works its wonders.
  7. The temper behind the tantrum:   Recognize it; try to remove the child from the source of the temper. Encourage them to hold it a bit longer, promise them incentives if they do so. Tell them, they grow a bit stronger, bigger, and mature if they do so. Promise them stories, together time, a play whatever interests them. Treat them as equal when they are able to deal with it.
  8. Attention time: Why not? Just five minutes of absolute positive attention time to them may help them resolve their own feelings and understand your point of view of saying no…Or other child’s reaction. Just you and your child without distractions, sharing, communication, love and care. Just pure pleasure.

All of the above works. One or the other at one of the time. It is just us learning and making them learn in the process.

Note: The author is Head Mistress at Tulsi Nagar, Indore Branch. She has several years of experience in education at reputed schools in India and abroad.

The views expressed here are personal.

हिंदी अनुवाद:

Does your child value her toys?

“My daughter has a cupboard full of toys, but doesn’t value them at all!” laments Vidya Gour the mother of a seven-year-old. Vidya herself grew up with two or three toys, with a new one added every birthday.

Today privileged children grow up with full baskets of and it’s hard to get them to understand how precious or valuable they are for the majority of India’s 480 million children.

“I don’t care if my toy breaks. I’ll get a new one,” says six-year-old Rishabh Verma. He has no clue why his parents don’t like such statements. Like Rishabh, many middle class kids couldn’t care less if they lose or break toys, since they have so many others to replace them.

Here are some ways to help children learn to value things.

Give away stuff:
Draw attention to the vast majority of underprivileged children. Explain how they manage — with few clothes, less food, and often no toys at all. Get your children to make packages of food, clothes and toy which they have out grown. Their choices are likely to be different from yours, but be willing to accommodate them. Identify a suitable family to give the packages to. It could be the family of construction workers living in tents, or your house helper. However it’s important to warn children not to outwardly show pity, disgust or condescension when they in interact with people from other sections of society. Go together and present the packages to them. Learning to practice charity will help your child realise how valuable every toy and dress is for the less privileged and will help them experience the joy of giving.

Examine new things:
A flood of birthday gifts can make some presents less appealing than others. Get your child to examine each new object before using it. If it is a toy/game/stationary she already has, or does not want, she should place it in a box for reuse. Such gifts could be given away to needy children, reused as a gift, or used later. Sifting will discourage your child from taking a new toy, playing with it for a few minutes, and then forgetting all about it.

Old toys can be recycled simply by selling them in a locally or on a second-hand goods website. This way children will become aware that they are doing something sensible by gifting or selling stuff, instead of letting it lie unused at home. They could be allowed to use the money realised to buy what they need.

Create hype: Before gifting your child a new object, generate some interest by talking about it, or showing internet content related to it. Once her curiosity is kindled, she will value it.

Withhold toys: If you find your child handling toys carelessly, throwing them around, or shoving them under the bed, take them away. Keep it with you until you think they will use it well, or give it away. Losing a toy usually makes it a ‘wanted’ object, so keep it for a while, in case your child asks for it again.

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

हिंदी अनुवाद: