The importance of Play | बच्चों को खेलना क्यों चाहिए?

Why should children play?

Simply because play is the work of childhood. Play helps children learn better, retain learning and enjoy the process. Play teaches children to reason, use logic, plan, work with others, sometimes lead, sometimes follow, to win or lose and to shake hands and make up after a contest.

It’s important that children play with appropriate toys and have the option of indoor and outdoor play. Use of battery toys, computer games and video games should not qualify as play as they are harmful in several ways.

  1. Such toys set the agenda for a child. It’s not the child thinking or working out what to do next; it’s the toy that decides.
  2. They tend to reduce social interaction and make children anti-social.
  3. Reduced social interaction impairs the development of communication skills.
  4. Such toys/games can be very addictive.
  5. They could cause obesity, eye and other health problems.

Children have everything to gain when you give them the gift of play. Depriving children of play opportunities could have negative consequences – depression, aggression and hostility.

हिंदी अनुवाद

बच्चों को खेलना क्यों चाहिए? क्योकि खेलना बचपन का अभिन्न अंग है। खेलना बच्चों के सीखने की क्षमता को बढ़ाने, याद रखने और प्रक्रिया का आनंद लेने में मदद करता है। खेलने से बच्चे कई महत्वपूर्ण बातें सीखते हैं, जैसे कारणों को जानना, तर्क का उपयोग करना, योजना बनाना, अन्य लोगों के साथ काम करना, कभी नेतृत्व करना, कभी पालन करना, जीतना या हारना और हाथ मिलाना एवं प्रतियोगिता के बाद एक हो जाना।

यह बहुत महत्वपूर्ण है कि बच्चे उपयुक्त खिलौनों से खेलें एवं उनके पास घर के अंदर व् बाहर खेलने का विकल्प हो। बैटरी चलित खिलौनों का प्रयोग, कंप्यूटर गेम्स एवं वीडियो गेम्स खेल की श्रेणी में नहीं आना चाहिए  क्योकि वे बच्चों के लिए कई मायनों में हानिकारक हैं।

  1. ऐसे खिलौने बच्चों के लिए कार्यसूची बना देते हैं। इसमें बच्चे खुद से कुछ नहीं सोच रहे होते हैं, ना ही वे आगे की कार्यप्रणाली बनाते हैं, ये निर्णय खिलौने लेते हैं।
  2. वे सामाजिक संवाद कम करते हैं, व् बच्चों को असामाजिक बनाते हैं।
  3. सामाजिक संवाद की कमी बच्चों के संचार कौशल को बाधित करती है।
  4. ऐसे खिलौने/गेम्स बच्चों की लत बन सकते हैं।
  5. वे मोटापे, आँख व् अन्य स्वास्थ्य सम्बंधित परेशानियों का भी कारण बन सकते हैं।

जब आप बच्चों को खेलने की स्वतंत्रता देते हैं तो वे सब कुछ सीख लेते हैं। अवसाद, आक्रामकता और शत्रुता – खेलने के अवसरों से वंचित बच्चों के नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं।

रचना सक्सेना द्वारा हिंदी में अनुवाद किया गया|

नोट: लेखक ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

 

“मुझे ये चाहिए, मैं कुछ नहीं जानता” – नखरों के राजकुमार

माता-पिता बनने के लिए किसी शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं होती और ना ही इससे यह पुष्टि होती है कि हम अपने बच्चों की मानसिक अवस्था को अच्छे से समझते हैं। जब भी बच्चों के व्यव्हार से जुडी कोई भी समस्या आती है हम सोचने लगते है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? अनेक समस्याओं में से एक है ”ध्यान आकर्षित करने हेतु ’नखरे’ करना”| मानव जाति अन्य प्रजातियों की तुलना में बच्चों को पालने में बहुत ज्यादा समय देती है; यह देश एवं क्षेत्र की परंपरा पर भी निर्भर करता है|  जिस क्षण शिशु माता पिता के पास आता है वह सबके आकर्षण का केंद्र बन जाता है।इसी के साथ रूठना,मनाना और प्यार करना शुरू हो जाता है| क्या हम बच्चों को खुद से खेलना सिखाते हैं? खुद के साथ रहना सिखाते हैं? जब तक शिशु 2 साल का होता है यह उसकी आदत बन जाती है। उनके लिए हम हमेशा उनके आसपास, उनके साथ होते हैं, उनकी असुरक्षा छुप जाती है और उनकी हर इच्छा पूरी होती है। उन्हें सामाजिक बनाने के लिए हम उनके साथ नकारात्मक व्यवहार करने लगते हैं, जैसे ‘ना’ कहना , ‘मत करो’, इत्यादि। हमारा यह बर्ताव उनके अन्दर एक अलग तरह की समस्या पैदा करता है, वे हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए गुस्सा करने लगते हैं।

इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए कुछ सुझाव हैं:

  1. स्वास्थ्य: सबसे पहले नब्ज़ देखें। देखिये कि बच्चों की ज़रूरतों का ध्यान रखा जा रहा हैं। कहिं वह भूखा, प्यासा, बीमार या थका हुआ तो नहीं है? यह सुनिश्चित करने के बाद अगले पड़ाव पर जाईये।
  2. नज़रंदाज़ कीजिये और बढ़ जाईये: यह बहुत अजीब लगता है जब हम इस बारे में सोचते हैं। “क्या यही रास्ता है?” पर विश्वास कीजिये यह काम करता है। यह पहला कदम है उनसे उनकी पहचान कराने का और हर समय ध्यान आकर्षित नहीं कराने का। ऐसा  करने से वे समझ जाते हैं “यह काम नहीं करेगा”। साथ ही इससे उन्हें समय मिलता है कि वे अपनी भावनाओं पर काम करें।
  3. बात टालने की कोशिश करे: यह तरीका जादुई है। जब वे हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं तब उनका ध्यान किसी और क्रिया की तरफ केन्द्रित कर दीजिये। कुछ और दिलचस्प दिखाईये, रहस्य साझा कीजिये, और गाना गाईये। मासूम विचारों को विचलित करना बहुत आसान है। भोला बने, नीचे गिर जाने का नाटक करें, उन्हें विचलित करने के लिए कुछ भी कीजिये। इसका अभ्यास कीजिये, यह बहुत आसान है।
  4. शांत रहिये, जैसा कि आप उम्मीद करते हैं: आप चाहते हैं कि बच्चा शांत रहे जबकि परिस्थितियां
    उसके अनुकूल नहीं होती हैं और वह गुस्सा करना चाहता है। यदि आप चिढने और चिल्लाने लगेंगे तो बच्चा शायद कभी नहीं समझ पायेगा। यदि हम भी उनके जैसे ही गुस्सा करने लगे तो हम उन्हें शांत रहना कैसे सिखायेंगे?
    हर तरह की परिस्थिति में शांत रहकर खुद को आदर्श साबित कीजिये। जब वे आपको आदर्श मानकर, शांत रहकर आपका प्रतिबिम्ब बने तब उन्हें प्यार करें  एवं उन्हें सराहें।
  5. हिम्मत न हारें: इसी कारणवश आपने  पहले “नहीं” कहने का निर्णय लिया था। अचानक, सिर्फ बच्चे के गुस्सा करने के बाद वो बात सही नहीं हो जाती। साथ ही, यदि आपने एक बार हार मान ली तो बच्चे को अपनी इच्छा पूरी कराने का नया तरीका मिल जाता है। इस बात का सदैव ध्यान रखे, यदि इससे बच्चे पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता तो शुरू में ही ”हाँ” कह दे; लेकिन एक बार ”नहीं” कहने के बाद अपना निर्णय ना बदले|
  6. गुदगुदी करना: यह तरीका बहुत प्रभावशाली है I मैंने खुद किया है।  जब भी मैं चाहती थी कि मेरा बेटा मेरी बात सुने और अनुपालन करे मैं उसे गुदगुदी करती थी। असल में यह एक जटिल स्थिति को सकारात्मक रुख पर ख़तम करता है| साथ ही इससे उनका परिचय हँसनें खिलखिलाने से होता है। हँसनें से तो आधी समस्या वैसे ही समाप्त हो जाती है |
  7. चिढ़ने का कारण समझिये: इसे पहचानिए , बच्चे को गुस्से के स्त्रोत से दूर कीजिये। उन्हें शांत रहने के लिए प्रोत्साहित करें, अगर वे ऐसा करते है तो उन्हें उनकी मर्ज़ी का कुछ अच्छा काम करने का वादा कीजिये। उन्हें कहिये कि अगर वे ऐसा करेंगे तो ताकतवर, बड़े व समझदार बनेंगे।. उनसे वादा कीजिये कि आप उन्हें कहानी सुनायेंगे, साथ समय व्यतीत करेंगे, उनके साथ खेलेंगे जो भी उन्हें अच्छा लगता है। अगर वे ऐसा करते हैं तो आप भी अपना वादा ज़रूर पूरा करें।
  8. साथ में समय व्यतीत करें: मात्र 5 मिनट का सकारात्मक समय उन्हें उनकी भावनाओ को हल करने व् आपका दृष्टिकोण समझने में बहुत मदद करेगा। केवल आप और आपका बच्चा बिना किसी अवरोध के, एक दूसरे से बात करे, उसे लाड-प्यार दे | यह आपके लिए भी बहुत आनंददायक क्षण होगा |

ये सभी सुझाव काम करते हैं। कभी ये तो कभी वो, पर काम जरुर करते है | उन्हें सिखाते-सिखाते हम भी बहुत कुछ सीख जाते है|

नोट: लेखिका, ऋतू सिंह, तुलसी नगर, इंदौर शाखा की प्रधानाध्यापिका हैं। उन्हें भारत व विदेश में शिक्षा के क्षेत्र में कई वर्षों का अनुभव है। यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English version: http://www.gyankriti.com/blog/i-am-here-and-i-want-this-tantrum-king/

रचना सक्सेना द्वारा अनुवादित |

बच्चों को खिलोनों का महत्त्व समझाये

“मेरी बेटी के पास बहुत सारे खिलौने हैं, किन्तु वह उनका महत्त्व नहीं समझती।”- विद्या गौर, जो एक सात साल की बच्ची की माँ हैं | विद्या खुद दो तीन खिलौनों के साथ बड़ी हुयी, और हर साल जन्मदिन पर एक नया खिलौना उनमे जुड़ जाता था ।आजकल के सुविधायुक्त जीवन में बच्चे टोकरी भर खिलौनों के साथ बड़े होते हैं, और बहुत मुश्किल है उन्हें यह समझाना कि भारत के 4 करोड़ 80 लाख में से अधिकतम बच्चों के लिए ये खिलौने कितने अनमोल हैं।

“मुझे कोई चिंता नहीं अगर मेरा खिलौना टूट जाता है, मुझे नया मिल जायेगा।” यह कहना है 6 साल के रिषभ वर्मा का। उसे नहीं पता कि उसके माता पिता को ऐसे कथन क्यों पसंद नहीं। रिषभ की ही तरह अनेक मध्यम वर्गीय बच्चे परवाह नहीं करते यदि उनके खिलौने गुम हो जाये या टूट जाये, क्योकि उन्हें पता है कि उन्हें दूसरे मिल जायेंगे।

यहाँ कुछ तरीके है जिससे बच्चों को वस्तुओं का महत्त्व समझाने में मदद होगी –

जरूरतमंद लोगों को बांटना

उनका ध्यान उन बच्चों की तरफ आकर्षित करें जो इन सुख सुविधाओं से वंचित हैं। समझाईये कि वे कम कपड़े व भोजन और बिना खिलौनों के साथ कैसे जीते हैं। अपने बच्चों से कहिये कि वे उन भोजन, कपड़े और खिलौनों के पैकेट बनाये जो उनके लिए पुराने हो गए हैं। उनकी पसंद आपसे अलग हो सकती है, किन्तु उन्हें स्वीकारने के लिए तैयार रहें।एक उपयुक्त परिवार को ढूंढे जिसे यह पैकेट दे सकें। ये परिवार निर्माण करने वाले मजदूर जो टेंट में रहते हैं या फिर आपके नौकर भी हो सकते हैं। हांलाकि बच्चों को यह समझाना भी आवश्यक है कि जब वे समाज के दूसरे तबके के लोगों से मिलें तो बहुत ज्यादा दया, घृणा या नम्रता न दिखाएँ। साथ में जाईये और उन्हें वो पैकेट दीजिये। चैरिटी करने से आपके बच्चे को एहसास होगा कि कम सुविधाओं वाले बच्चों के लिए ये कपड़े और खिलौने कितने मूल्यवान हैं और साथ ही उन्हें चैरिटी का सुखद अनुभव भी होगा।

नई चीजों की जांच करना

जन्मदिन पर ढेर सारे तोहफे मिल जाने पर कुछ तोहफे उतने आकर्षक नहीं लगते | इस्तेमाल करने से पहले अपने बच्चे को पहले हर नयी चीज़ को ध्यान से देखने दें।अगर वे कोई ऐसे खिलौने/गेम/पाठ्यसामग्री है जो बच्चे के पास पहले से है, या उसे उसकी आवश्यकता नहीं है, तो वह उसे एक बक्से में सम्हाल कर रख ले। ऐसे तोहफे किसी जरूरतमंद को दे सकते है, तोहफे के रूप में किसी और को दे सकते हैं या बाद में उपयोग में ले सकते हैं|

रीसायकल करना

पुराने खिलौने किसी दूकान या वेबसाइट पर बेचे भी जा सकते हैं। इस तरह बच्चे जागरूक होंगे कि उन चीज़ों को किसी को देकर या बेचकर कुछ समझदारी का कम कर रहे हैं बजाये के घर पर  बिना उपयोग में लाये पड़े हुए हैं। इसके बदले में उन्हें अनुमति दी जा सकती है कि उन्हें जिस चीज़ की आवश्यकता है वो खरीद सकते हैं।

उत्सुकता बढ़ाये

कोई भी नयी वस्तु उपहार में देने से पहले उसके बारे में बच्चे से बात करके या इन्टरनेट पर उससे सम्बंधित सामग्री दिखाकर दिलचस्पी बढ़ाये। एक बार उसकी जिज्ञासा प्रज्वलित हो गयी वो उस वस्तु का महत्त्व समझेगा।

अनुचित प्रयोग को नियंत्रित करें

यदि आपका बच्चा अपने खिलौनों को लेकर लापरवाह है, उन्हें फेंकता है या बिस्तर के नीचे धकेलता है, उनसे वह वापस ले लीजिये। जब तक आपको नहीं लगता कि वह दोबारा ऐसा नहीं करेगा, खिलौना अपने पास ही रखिये, या किसी को दे दीजिये।जब वह उस खिलौने को गँवा देगा तब वह उसके लिए जरुरत बन जायेगा, हो सकता है वह आपसे वो खिलौना मांग ले इसलिए कुछ देर उसे अपने पास ही रखिये|

नोट: लेखक, योगराज पटेल, ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English version: http://www.gyankriti.com/blog/does-your-child-value-her-toys/

रचना सक्सेना द्वारा अनुवादित |

“I AM HERE AND I WANT THIS” – Tantrum King

Becoming parents requires no degree; also it does not guarantee our understanding the psychology of the little ones. Sometimes we are so baffled when small pin like situations arise and we are in a fix. How to deal with this one? One among the many is

“Children seeking attention and throwing tantrums”

Humans have the longest relationship nourishing period; it stretches according to the culture of the country. The moment a child arrives to the parent, it becomes the centre of attraction for them. Then starts the fussing, loving and nurturing part. Do we also teach the children to play by themselves, to be with themselves? This turns into a habit by the time a child turns 2 years old. For them we are always around, we are always there, their insecurities are covered up and their desires fulfilled. In the process of readying them for the society, we start a reverse process of denials, saying no, don’t, afterwards. This initiates a different problem in child seeking our uninterrupted attention by throwing tantrum.

Here are some helpful tips to deal with this:

  1. Health: First and foremost check the vitals. See, if the child has his needs taken care of. Whether or not he is either, hungry, thirsty, sick or tired. Once this is done move to other steps of how to deal with it.
  2. Ignore and Walk away: It seems to be an awkward way when we think about it. “Is this the way? “But believe me it works. It is the first step to introduce them to their own selves and not to seek attention all the time. By doing this they come to know “This doesn’t work”. Also, it gives them time to work on their emotions.
  3. Avert / Act silly: This works wonders. Just distract them towards something else from their immediate focus of attention. Point out to something else, show them something interesting, tell them a secret, and sing them a song. Innocent minds can be distracted easily. Act silly, topple over, fall down, just anything to distract. Practice the trick and OH! It can be so much easier.
  4. Stay Calm as You Seek: Is this not what it is all about. You desire for the child to stay calm when the situation is making him/her to throw tantrum. Tell the child let’s reason it out later. If you start yelling and shouting, then the child may never be able to understand. What is this fuss all about as you are reciprocating in the same way? Be the role model in displaying the calm and coolness in all the adverse situations. Love them when they display themselves as the role modelled representations of your coolness and calmness.
  5. Don’t give In: After all this is why you took the first decision of saying “no”. Suddenly, after the tantrum it cannot become right. Also, once you give in the child has discovered a new way of getting his wish fulfilled. Be careful, either say yes at the start if it does not matter in the child’s development, but do not change your decision to “yes” once said no.
  6. Tickle: This works wonderfully well. I have tried. Every time I need my son to listen to me and comply I tickle. It actually ends a complex situation on a positive note. Also, who can resist tickling? It also introduces them to laughter and smiles. And hormone to help them to do so works its wonders.
  7. The temper behind the tantrum:   Recognize it; try to remove the child from the source of the temper. Encourage them to hold it a bit longer, promise them incentives if they do so. Tell them, they grow a bit stronger, bigger, and mature if they do so. Promise them stories, together time, a play whatever interests them. Treat them as equal when they are able to deal with it.
  8. Attention time: Why not? Just five minutes of absolute positive attention time to them may help them resolve their own feelings and understand your point of view of saying no…Or other child’s reaction. Just you and your child without distractions, sharing, communication, love and care. Just pure pleasure.

All of the above works. One or the other at one of the time. It is just us learning and making them learn in the process.

Note: The author is Head Mistress at Tulsi Nagar, Indore Branch. She has several years of experience in education at reputed schools in India and abroad.

The views expressed here are personal.

हिंदी अनुवाद: http://www.gyankriti.com/blog/tantrum-hindi/

Does your child value her toys?

“My daughter has a cupboard full of toys, but doesn’t value them at all!” laments Vidya Gour the mother of a seven-year-old. Vidya herself grew up with two or three toys, with a new one added every birthday.

Today privileged children grow up with full baskets of and it’s hard to get them to understand how precious or valuable they are for the majority of India’s 480 million children.

“I don’t care if my toy breaks. I’ll get a new one,” says six-year-old Rishabh Verma. He has no clue why his parents don’t like such statements. Like Rishabh, many middle class kids couldn’t care less if they lose or break toys, since they have so many others to replace them.

Here are some ways to help children learn to value things.

Give away stuff:
Draw attention to the vast majority of underprivileged children. Explain how they manage — with few clothes, less food, and often no toys at all. Get your children to make packages of food, clothes and toy which they have out grown. Their choices are likely to be different from yours, but be willing to accommodate them. Identify a suitable family to give the packages to. It could be the family of construction workers living in tents, or your house helper. However it’s important to warn children not to outwardly show pity, disgust or condescension when they in interact with people from other sections of society. Go together and present the packages to them. Learning to practice charity will help your child realise how valuable every toy and dress is for the less privileged and will help them experience the joy of giving.

Examine new things:
A flood of birthday gifts can make some presents less appealing than others. Get your child to examine each new object before using it. If it is a toy/game/stationary she already has, or does not want, she should place it in a box for reuse. Such gifts could be given away to needy children, reused as a gift, or used later. Sifting will discourage your child from taking a new toy, playing with it for a few minutes, and then forgetting all about it.

Recycle:
Old toys can be recycled simply by selling them in a locally or on a second-hand goods website. This way children will become aware that they are doing something sensible by gifting or selling stuff, instead of letting it lie unused at home. They could be allowed to use the money realised to buy what they need.

Create hype: Before gifting your child a new object, generate some interest by talking about it, or showing internet content related to it. Once her curiosity is kindled, she will value it.

Withhold toys: If you find your child handling toys carelessly, throwing them around, or shoving them under the bed, take them away. Keep it with you until you think they will use it well, or give it away. Losing a toy usually makes it a ‘wanted’ object, so keep it for a while, in case your child asks for it again.

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

हिंदी अनुवाद: http://www.gyankriti.com/blog/hindi-toys-value/

Tips for Handling the First Days of Preschool

Tip 1: Don’t rush through the morning: No one likes to race through the school morning routine — especially on the first day. So get everyone up at a reasonable hour. That way, you won’t have to hurry your child as he munches through his morning meal — or risk being late because you had to tame your frazzled tot’s tantrum.

Tip 2: Arrive fashionably early: This way, your little one can slowly settle in before the real action starts. He’ll also get more face time with the teacher, too, which will be tougher to do once all the other kids are there to vie for her attention.

Tip 3: Bring a comfort object: Let your child bring along his favorite stuffed animal (or blanket, or whatever object does the trick) so the new setting doesn’t feel so scary. And once your teddy-toting tot feels comfortable with his surroundings, he’ll let go of his lovey — or at least leave it when he plays.

Tip 4: Put on a happy face: Anxiety may be eating you up inside, but don’t let on — nerves are highly contagious. If your tone’s upbeat and you seem confident that your child will have a good time, there’s a better chance that he’ll be upbeat, too.

Tip 5: Hang around, but don’t hover: We sometimes allow parents stay in the classroom for all or part of the first few days, so if you can swing it, stick around. Knowing that you’re within clinging distance will give your kid the courage to explore his new digs. Then, as your child feels more secure, gradually melt into the background. Your goal is to let the teacher take over so you can get on with your day.

Tip 6: Keep good-byes short and sweet: When it’s your cue to make an exit, hold back your tears a little longer (smiling helps unscrunch those furrows in your worried brow), give your new preschooler a hug, and let him know when you’ll be back (“I’ll pick you up after lunch”). Then head out — don’t linger (he can’t get on with his day until you do). And no matter how tempting, never sneak out when your preschooler is looking the other way. It’ll make him feel insecure and less trusting.

Just remember, it’s normal for kids to have a meltdown when it’s time to separate (though many don’t). But even if your child is crying a lot, chances are he’ll be fine five minutes after you walk out the door. If it’s taking a while for your little one to adjust, don’t panic — our teachers (and their assistants) have seen it all and they know just what to do, so ask his teacher for help. Just don’t be surprised if your child’s too happy to say hello to you (or talk about his day) once preschool pick up rolls around!

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

Montessori Resources for Parents and Teachers

We at Gyankriti believe that parents, teachers and students are the three pillars in early childhood education. We have always promised to avail best and experienced teachers, however the results depend largely on support of the parents. In our attempt to educate parents towards Early Childhood Care and Education we are sharing some good Montessori resources that I came across in my travels along the internet highway. I hope that this information will be really helpful for parents during summer vacations.

Information about Dr Maria Montessori

MONTESSORI IN THE HOME

The Wonder Years – A Montessori home environment

Parenting for independence blogpost

Practical life in the home – a good list of undertakings that a child will appreciate

Summer vacation – a practical life approach

Summer reading ideas

Montessori at home: the senses

Montessori prepared environment at home

How to create a prepared environment

MONTESSORI AT HOME WEBLOGS

Montessori for everyone – Montessori home schooling

Moose Huntress – Montessori at home website

Adventures of a rainbow mama

INFANT TODDLER YEARS

The Montessori Merthod for the Infant Toddler

Baby’s Montessori room

23 month old making his own snack, montessori

WEBSITES

Montessori videos on You Tube

Montessori videos on Vimeo

Montessori for infants and toddlers

A general Montessori website

Montessori content on Blogger

Montessori images on Flickr

MONTESSORI TEACHER’s BLOGS

Montessori on the shelf

Moveable alphabet

Montessorri: Planting the seeds of learning

PS: If you have any other good resources than please share them in comments. Thanks! 🙂

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

कल के दीप्तिमान बच्चों के लिए पाठ्यक्रम

जब हमने ज्ञानकृति कि स्थापना की थी तब हम हमारे विद्यर्थियों का ऐसा सर्वांगीण विकास चाहते थे जिसके द्वारा वे मर्मस्पर्शी भी हो और अपने मस्तिष्क का भी प्रयोग कर सके | इसके अलावा वे शैक्षणिक योग्यता के साथ साथ भावनात्मक ,शारीरिक ,सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास भी कर सके |हमने चाहा कि हमारा पाठ्यक्रम हमारे सम्माननीय सलाहकारों एवं प्रिय सहयोगियों के अनुसंधान का सार हो ।इस सबको सुचारु रूप से चलाने में internet का महती योगदान हैं जिसके द्वारा हमारी सभी शाखाओं पर स्थित प्राचार्यो एवं शिक्षिकाओं का काम आसान हो गया हैं ।यह सभी लोग अपने तमाम अनुभवों के साथ इस प्री-प्राइमरी पाठ्यक्रम को आकर्षक एवं उपयुक्त बनाने में जुट गए हैं |

हम चाहते हैं कि हमारा पाठ्यक्रम जिज्ञासु प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाला हो | इसका संपूर्ण प्रारूप निम्नलिखित प्रश्नों पर आधारित हैं जिन्होंने मुझे मेरे प्री-प्राइमरी के आधार कार्य एवं अनुसंधान के दौरान परेशान किया

1.एक १.५ से ६ साल के छोटे से बच्चे से हम क्या क्या सीखने की अपेक्षा करते हैं?

2.उनकी पढ़ाई में हाथ बटाने का सर्वोत्तम तरीका क्या हैं?

3.एक पालक एवं शिक्षक के तौरपर हम कैसे जान पाएंगे कि उन्होंने क्या क्या सीखा ?

कोई भी शैक्षणिक कार्यक्रम अपने वांछित परिणामों से सफल विद्यार्थियो की विशेषता बताने वाला होता हैं । हमारा पाठ्यक्रम भी निम्नलिखित उद्देश्यों पर आधारित हैं

* हमारे विद्यार्थी एक प्रश्नकर्ता हो जो अपनी पढ़ाई लिखाई के प्रति प्रेम का आनंद उठाये । इसके लिए एक शिक्षक कि भूमिका,उसकी जिज्ञासा को पोषित करने वाले की हो |

* हमारे विद्यार्थी दूसरों की भावनाओं और जरूरतों कि क़द्र करें । हमें उनमे सत्यनिष्ठा ,ईमानदारी ,निष्पक्षता एवं इन्साफ के बीज बोने का प्रयत्न करना चाहिए |

* वे शारीरिक शिक्षा के साथ साथ व्यक्तिगत कल्याण का महत्व भी समझे|

*वे आत्मविश्वास से एवं व्यग्र हुए बिना,किसी भी परिस्थिति का सामना कर सके |

*वे गणितीय चिन्हों के साथ साथ एक से अधिक भाषाओँ में अपनी कल्पनाओं को ग्रहण एवं व्यक्त कर सकें |

* वे ज्ञानकृतिमें वैश्विक प्रसंगों एवं उनकी अहमियत को खोजने में अपना समय व्यतीत करें |

यह सब करते हुए एक प्रीस्कूल जाने वाले बच्चे कि हैसियत से वे ज्ञान का अकूत भण्डार प्राप्त करेंगे| इसीलिए इस कार्यक्रम का मूलभूत आधार एक जिज्ञासु वृत्ति कि संरचना करना हैं ।हमारे शिक्षक, क्लासरूम एवं अन्य स्थानो पर उनकी जिज्ञासा को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं| अलगअलग कक्षाओं में अलगअलग विषय एवं विषय वस्तु का चयन किया गया हैं जैसे अक्षर ,वर्णमाला ,अंक ,प्रकृति ,समाज एवं त्यौहार इत्यादि ।समय पूर्व साक्षरता एवं गणितीय ज्ञान को परंपरागत तरीकों से सिखाया जा सकता हैं ।हमारे विद्यार्थी सामाजिक ,वैचारिक ,स्व प्रबंधन एवं सम्प्रेषण में प्रवीणता हासिल करने के लिए प्रयत्नशील होंगे|

हम हमेशा ही यही कहते हैं की हमारा पाठ्यक्रम एक प्रगतिशील कार्य हैं इसलिए ज्ञानकृति पाठ्यक्रमकी दृष्टी के प्रति आपके सुझावों का हम स्वागत करते हैं |

जल्द ही हमारी कुछ कल्पनाएँ और lesson-plans हम आपसे साझा करेंगे|

नोट: लेखक, योगराज पटेल, ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English Translation: http://www.gyankriti.com/blog/developing-curriculum-for-tomorrows-brightest-kids/

Developing curriculum for tomorrow’s brightest kids

When we started Gyankriti, we wanted to support the overall growth of a developing kid, affecting hearts as well as minds and addressing  emotional, physical, social and cultural needs along with academic welfare. The entire curriculum was supposed to combine the best research and practice of our honourable advisers and dearest colleagues. The internet makes it easy for our teachers and principals located at all the centres in Indore. All of them with a wealth of experience and knowledge from various schools in India and abroad are working together to create a engaging and relevant pre-primary programme.

 

Our programme aims to offer a comprehensive, ‘curiosity development’ approach to teaching and learning. The entire framework is primarily based on following questions that troubled me during my research and groundwork on pre-primary education:

  1. What do we expect so small, 1.5 years to 6 years old, children to learn?
  2. What is the best way to assist their learning?
  3. How will we as parents and teachers know what they have learned?

Any academic program has a set of desired outcomes to characterize a successful student. Our curriculum is based on following objectives:

  • The student can be an ‘inquirer’ enjoying his/her love of learning, the role of teachers in this case is to nurture student’s curiosity.
  • The students must show sensitivity towards feelings and needs of others. We must also try to sow the seeds of integrity, honesty and a sense of fairness and justice as this stage.
  • They should understand the importance of physical education and personal well-being.
  • They should have confidence to deal with unfamiliar situations without anxiety.
  • They receive and express ideas and information confidently in more than one language including the language of mathematical symbols.
  • They should spend time in Gyankriti exploring themes which have global relevance and importance.

In doing so, they will acquire tremendous amount of knowledge, well at least as a preschooler. At the heart of this programme is structured curiosity building approach. Teachers focus on facilitating inquiry in the classroom and beyond.

The topics or themes of each grade level represent a set of traditional topics like alphabets, numbers, nature, society and festivals. Some specific aspects of pre-literacy and pre-math skills that can be learned through more traditional approaches. Students will also work to develop communication, social, self-management and thinking skills.

We always say that our curriculum is a ‘work in progress’ so we are open to your suggestions on our vision of Gyankriti curriculum. Very soon we will share some of our ideas and sample lesson plans here.

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

हिंदी अनुवाद: http://goo.gl/VBpy30

Development of Multiple Intelligence at Gyankriti

Gyankriti aims at developing

“The eight multiple intelligence” – as defined by Howard Gardener

Image source: http://www.careernotes.ca/uploaded-content/2010/01/Multiple-Intelligences.jpg

Linguistic: 

Deals with written and spoken words. Children with high verbal -linguistic intelligence display a facility with words and languages. They are typically good at reading,writing,telling stories and memorizing words along with dates. They tend to learn best by reading,taking notes,listening ,and by discussing and debating about what they have learned.

Gyankriti linguistics will be skilled to express themselves. They will be able to tell “Nanhi nanhi batein”, those small secrets around which their lives revolve at this age. Their enthusiasm,curiosity,love,inhibitions all will get an expression . They will be more aware.

Naturalistic:

Deals with nurturing and relating information to one’s natural surroundings. This includes classifying natural forms such as animal and plant species ,and rocks and mountain types:and the applied knowledge of nature in farming,mining etc. Children with a strong naturalistic intelligence also displays organizing ability.

All gyankritians are going to be made sensitive to nature and their surroundings. And why not….It is the nature that keeps us grounded to our roots. It implicates that all the beings are equal. At gyankriti we aim at making them known to the social and environmental grace granted to us.

Intra personal:

Deals with introspective and self reflective capabilities. Children with strong interpersonal intelligence have a deep understanding of the self -their strengths and weakness.

At Gyankriti, converging their vision towards their own self, introspection,making them known to their own negatives will be aimed at. And what else do we need as human beings ,if we learn to do this. This is the first step towards self improvement.

Interpersonal:

Deals with the ability to interact with others. In theory, Children who have strong interpersonal intelligence tends to be extroverts, they are sensitive to others mood feelings temperaments and motivations and display an ability to co-operate in order to work as part of a group. They communicate effectively and empathize easily with others and maybe either leaders or followers they typically learn best by working with others and often enjoy discussion and debate. 

With the wonderful changes taking place in the Indian society. Children need to be trained to be more humane, to love each other, to keep others before one’s own self. Sochiye , If at Gyankriti we are able to create such enhanced values in our children ,then how beautiful they will make our society.

Bodily -Kinesthetic:

Children who have a bodily – kinesthetic intelligence seem to learn better by involving  muscular movement ( hands on , actual lab experiments ), and generally good at physical activities such as sports or dance. They may enjoy acting or performing and in general they are good at building and making things. They often learn best by doing something physically other then by reading or hearing about it.

In today,s world children should be told about how to keep their body fit at a very early age. The change in today’s lifestyle demands it. We also know “HEALTH IS WEALTH”. So, to gain this wealth this intelligence needs to be triggered and fanned. Let’s do it.

Spatial:

Deals with special judgement and the ability to visualize the minds eye.

Careers which suit those with this type of intelligence include artist, designers and architects. A spatial person is also good with puzzles. The four parts of spatial awareness are distance,form(shape),direction,position(in relationships to others) Spatial awareness is the knowledge of where you are in relationship to other people and objects in your environment. To develop spatial awareness children learn concepts ,such as

Musical:

Deals with sensitivity to sounds rhythms, tones and music. Language skills are typically highly developed in those whose base intelligence is musical in addition, they will sometimes use songs or rhythms to learn. They have sensitivity to rhythm, pitch, meter, tone, melody or timber.

WORLD has music all round. All natural sounds have a certain rhythm to themselves, We only need musical ears to appreciate it.

At Gyankriti we aim to make all the ears musical., to be able to hear the music of silence, sound of the ripples generated, music in the chirping of the birds,

Logical – Mathematical:

Deals with logic, abstractions, reasoning and numbers. A person with this intelligence may display, apart from traditional mathematical abilities, reasoning capabilities, recognizing abstract patterns, scientific thinking & investigation, to ability to perform complex calculations.

AHHH…. the world is so logical these days ,and what will one do if our children are unable to keep this pace. Great scientists like Einstein are great not only for their inventions ,but also for their unique brain developments. They could appreciate a piano piece as well as a formula. KAASH… we have places where this kind of environment could be generated for the development of both the hemispheres of the brain. At Gyankriti , our logo represents us. LOGIC and CREATIVITY is what we stand for.

Note: The author is Head Mistress at Tulsi Nagar, Indore Branch. She has several years of experience in education at reputed schools in India and abroad.

The views expressed here are personal.