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Handling a fussy eater | खाने की आदतो के बारे मे कुछ सुझाव


Many parents have complained/informed about eating habits of their children. Here are some suggestion:

Handling a fussy eater
A fussy eater is no freak. Fussy eating is perfectly normal, especially for children. As children experiment with food, they develop preferences just like adults. The solution is to offer a wider variety of foods so that they are more likely to choose favourites across food groups. Variety also provides different vitamins and minerals. Don’t stress out if your child refuses to eat bananas. Just look for other foods which contain similar nutrients.

Try to improve your child’s appetite by increasing her physical activity. A hungry child is less likely to be fussy about food. Health drinks and vitamin supplements are not the only solution for fussy eaters. Try to meet your child’s nutritional needs as you would meet your own.

My son refuses to drink milk
“My son refuses to drink milk. It seems to me that all children readily accept milk- based beverages. But my 5-year-old son absolutely refuses to have milk with or without a nutritional supplement. I’m worried that he will lose out on vital nutrients.” – A concerned father

A balanced diet has the most ‘vital nutrients’. So if your child is getting a healthy mix of foods, with portions of staples, proteins and vegetables, you need not worry about his milk aversion. Dairy products are an important source of calcium and minerals, but can be found in milk products as well. Introduce him to curd, flavoured yoghurt, paneer, cheese and ice-cream which will provide him calcium. Other foods rich in calcium include leafy greens, almonds and dry fruits. Health drinks are good but not indispensable. Just focus on healthy eating habits, and don’t worry about the milk. You could reintroduce it after a few months. Alternatively, try flavoured milk. If your child develops a taste for it, you can slowly shift to flavoured health drinks. Try getting a friend, teacher or relative to convince your child to drink milk every day. Sometimes, children are more open to suggestions from people other than their parents.

कई अभिभावकों ने अपने बच्चों की खाने की आदतों के बारे में शिकायत/सूचना दी है।  यहाँ कुछ सुझाव हैं :

खाना खाने में नखरे करना एकदम सामान्य है, खासकर बच्चों के लिए।  क्योकि बच्चे भोजन के साथ प्रयोग करते हैं, वे अपनी पसंद बनाने लगते हैं  बिलकुल बड़ों की तरह। समाधान यह है कि भोजन की व्यापक विविधता पेश की जाए ताकि उन्हें चयन करने के लिए अधिक संभावनाएं प्राप्त हो।  विविधता से उन्हें भिन्न भिन्न प्रकार के विटामिन व खनिज भी मिलते हैं।यदि आपका बच्चा केला खाने से मना करता है तो चिंता मत कीजिये।  उसे कुछ और दीजिये जिसमे सामान प्रकार के पौष्टिक तत्व हों।

बच्चे की भूख बढ़ाने के लिए उसकी शारीरिक गतिविधियों को बढ़ाएं।  अगर बच्चा भूखा होगा तो वह भोजन के लिए कम नखरे करेगा। कृत्रिम पेय पदार्थ और विटामिन के पूरक ही एकमात्र समाधान नहीं है।  अपने बच्चे के पोषण सम्बंधित जरूरतों को ऐसे ही पूरा कीजिये जैसे आप अपनी करते हैं।

मेरा बच्चा दूध पीने से मना करता है
“मेरा बेटा दूध पीने से मना करता है।  ऐसा लगता है कि सभी बच्चे दूध के उत्पादों को ख़ुशी से स्वीकारते हैं।  किन्तु मेरा ५ वर्षीय बेटा दूध बिलकुल नहीं पीता। वह सादा दूध या पौष्टिक पूरक मिला कर दोनों के लिए ही मना करता है।” – एक चिंतित पिता

एक संतुलित आहार में महत्वपूर्ण ‘पौष्टिक तत्व’ होते हैं।  तो यदि आपका बच्चा पौष्टिक भोजन, प्रोटीन और सब्जियां खा रहा है तो आपको दूध के बारे में चिंता करने की जरुरत नहीं है। डेयरी उत्पादों में महत्वपूर्ण केल्शियम और खनिज होते हैं, किन्तु वे दूध के उत्पादों में भी पाये जाते हैं।  उसे दही, फ्लेवर वाला मट्ठा, पनीर और आइस-क्रीम दीजिये, इनसे भी उसे कैल्शियम प्राप्त होगा।  अन्य कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थों में हरी पत्ते वाली सब्जियां, बादाम और सूखे मेवे सम्मिलित हैं।  हेल्थ पदार्थ अच्छे हैं किन्तु अनिवार्य नहीं हैं।  बस स्वस्थ खाने की आदतों पर ध्यान दीजिये, दूध की चिंता मत कीजिये।  आप उसे कुछ महीनों बाद वापस देने की कोशिश कर सकते हैं। एक विकल्प यह है कि फ्लेवर वाला दूध देने की कोशिश कीजिये।  यदि आपके बच्चे को वह  स्वाद अच्छा लग जाता है तो धीरे से फ्लेवर वाले हेल्थ ड्रिंक देना शुरू कर सकते हैं। उसे प्रतिदिन दूध पीने के लिए समझाने के लिए किसी दोस्त, शिक्षक या रिश्तेदार की मदद भी ले सकते हैं। कभी कभी बच्चे उनके माता-पिता से ज्यादा किसी और के सुझावों को सही मानते है|

रचना सक्सेना द्वारा हिंदी में अनुवाद किया गया|

नोट: लेखक ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

The importance of Play | बच्चों को खेलना क्यों चाहिए?

Why should children play?

Simply because play is the work of childhood. Play helps children learn better, retain learning and enjoy the process. Play teaches children to reason, use logic, plan, work with others, sometimes lead, sometimes follow, to win or lose and to shake hands and make up after a contest.

It’s important that children play with appropriate toys and have the option of indoor and outdoor play. Use of battery toys, computer games and video games should not qualify as play as they are harmful in several ways.

  1. Such toys set the agenda for a child. It’s not the child thinking or working out what to do next; it’s the toy that decides.
  2. They tend to reduce social interaction and make children anti-social.
  3. Reduced social interaction impairs the development of communication skills.
  4. Such toys/games can be very addictive.
  5. They could cause obesity, eye and other health problems.

Children have everything to gain when you give them the gift of play. Depriving children of play opportunities could have negative consequences – depression, aggression and hostility.

हिंदी अनुवाद

बच्चों को खेलना क्यों चाहिए? क्योकि खेलना बचपन का अभिन्न अंग है। खेलना बच्चों के सीखने की क्षमता को बढ़ाने, याद रखने और प्रक्रिया का आनंद लेने में मदद करता है। खेलने से बच्चे कई महत्वपूर्ण बातें सीखते हैं, जैसे कारणों को जानना, तर्क का उपयोग करना, योजना बनाना, अन्य लोगों के साथ काम करना, कभी नेतृत्व करना, कभी पालन करना, जीतना या हारना और हाथ मिलाना एवं प्रतियोगिता के बाद एक हो जाना।

यह बहुत महत्वपूर्ण है कि बच्चे उपयुक्त खिलौनों से खेलें एवं उनके पास घर के अंदर व् बाहर खेलने का विकल्प हो। बैटरी चलित खिलौनों का प्रयोग, कंप्यूटर गेम्स एवं वीडियो गेम्स खेल की श्रेणी में नहीं आना चाहिए  क्योकि वे बच्चों के लिए कई मायनों में हानिकारक हैं।

  1. ऐसे खिलौने बच्चों के लिए कार्यसूची बना देते हैं। इसमें बच्चे खुद से कुछ नहीं सोच रहे होते हैं, ना ही वे आगे की कार्यप्रणाली बनाते हैं, ये निर्णय खिलौने लेते हैं।
  2. वे सामाजिक संवाद कम करते हैं, व् बच्चों को असामाजिक बनाते हैं।
  3. सामाजिक संवाद की कमी बच्चों के संचार कौशल को बाधित करती है।
  4. ऐसे खिलौने/गेम्स बच्चों की लत बन सकते हैं।
  5. वे मोटापे, आँख व् अन्य स्वास्थ्य सम्बंधित परेशानियों का भी कारण बन सकते हैं।

जब आप बच्चों को खेलने की स्वतंत्रता देते हैं तो वे सब कुछ सीख लेते हैं। अवसाद, आक्रामकता और शत्रुता – खेलने के अवसरों से वंचित बच्चों के नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं।

रचना सक्सेना द्वारा हिंदी में अनुवाद किया गया|

नोट: लेखक ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.


“मुझे ये चाहिए, मैं कुछ नहीं जानता” – नखरों के राजकुमार

माता-पिता बनने के लिए किसी शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं होती और ना ही इससे यह पुष्टि होती है कि हम अपने बच्चों की मानसिक अवस्था को अच्छे से समझते हैं। जब भी बच्चों के व्यव्हार से जुडी कोई भी समस्या आती है हम सोचने लगते है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? अनेक समस्याओं में से एक है ”ध्यान आकर्षित करने हेतु ’नखरे’ करना”| मानव जाति अन्य प्रजातियों की तुलना में बच्चों को पालने में बहुत ज्यादा समय देती है; यह देश एवं क्षेत्र की परंपरा पर भी निर्भर करता है|  जिस क्षण शिशु माता पिता के पास आता है वह सबके आकर्षण का केंद्र बन जाता है।इसी के साथ रूठना,मनाना और प्यार करना शुरू हो जाता है| क्या हम बच्चों को खुद से खेलना सिखाते हैं? खुद के साथ रहना सिखाते हैं? जब तक शिशु 2 साल का होता है यह उसकी आदत बन जाती है। उनके लिए हम हमेशा उनके आसपास, उनके साथ होते हैं, उनकी असुरक्षा छुप जाती है और उनकी हर इच्छा पूरी होती है। उन्हें सामाजिक बनाने के लिए हम उनके साथ नकारात्मक व्यवहार करने लगते हैं, जैसे ‘ना’ कहना , ‘मत करो’, इत्यादि। हमारा यह बर्ताव उनके अन्दर एक अलग तरह की समस्या पैदा करता है, वे हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए गुस्सा करने लगते हैं।

इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए कुछ सुझाव हैं:

  1. स्वास्थ्य: सबसे पहले नब्ज़ देखें। देखिये कि बच्चों की ज़रूरतों का ध्यान रखा जा रहा हैं। कहिं वह भूखा, प्यासा, बीमार या थका हुआ तो नहीं है? यह सुनिश्चित करने के बाद अगले पड़ाव पर जाईये।
  2. नज़रंदाज़ कीजिये और बढ़ जाईये: यह बहुत अजीब लगता है जब हम इस बारे में सोचते हैं। “क्या यही रास्ता है?” पर विश्वास कीजिये यह काम करता है। यह पहला कदम है उनसे उनकी पहचान कराने का और हर समय ध्यान आकर्षित नहीं कराने का। ऐसा  करने से वे समझ जाते हैं “यह काम नहीं करेगा”। साथ ही इससे उन्हें समय मिलता है कि वे अपनी भावनाओं पर काम करें।
  3. बात टालने की कोशिश करे: यह तरीका जादुई है। जब वे हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं तब उनका ध्यान किसी और क्रिया की तरफ केन्द्रित कर दीजिये। कुछ और दिलचस्प दिखाईये, रहस्य साझा कीजिये, और गाना गाईये। मासूम विचारों को विचलित करना बहुत आसान है। भोला बने, नीचे गिर जाने का नाटक करें, उन्हें विचलित करने के लिए कुछ भी कीजिये। इसका अभ्यास कीजिये, यह बहुत आसान है।
  4. शांत रहिये, जैसा कि आप उम्मीद करते हैं: आप चाहते हैं कि बच्चा शांत रहे जबकि परिस्थितियां
    उसके अनुकूल नहीं होती हैं और वह गुस्सा करना चाहता है। यदि आप चिढने और चिल्लाने लगेंगे तो बच्चा शायद कभी नहीं समझ पायेगा। यदि हम भी उनके जैसे ही गुस्सा करने लगे तो हम उन्हें शांत रहना कैसे सिखायेंगे?
    हर तरह की परिस्थिति में शांत रहकर खुद को आदर्श साबित कीजिये। जब वे आपको आदर्श मानकर, शांत रहकर आपका प्रतिबिम्ब बने तब उन्हें प्यार करें  एवं उन्हें सराहें।
  5. हिम्मत न हारें: इसी कारणवश आपने  पहले “नहीं” कहने का निर्णय लिया था। अचानक, सिर्फ बच्चे के गुस्सा करने के बाद वो बात सही नहीं हो जाती। साथ ही, यदि आपने एक बार हार मान ली तो बच्चे को अपनी इच्छा पूरी कराने का नया तरीका मिल जाता है। इस बात का सदैव ध्यान रखे, यदि इससे बच्चे पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता तो शुरू में ही ”हाँ” कह दे; लेकिन एक बार ”नहीं” कहने के बाद अपना निर्णय ना बदले|
  6. गुदगुदी करना: यह तरीका बहुत प्रभावशाली है I मैंने खुद किया है।  जब भी मैं चाहती थी कि मेरा बेटा मेरी बात सुने और अनुपालन करे मैं उसे गुदगुदी करती थी। असल में यह एक जटिल स्थिति को सकारात्मक रुख पर ख़तम करता है| साथ ही इससे उनका परिचय हँसनें खिलखिलाने से होता है। हँसनें से तो आधी समस्या वैसे ही समाप्त हो जाती है |
  7. चिढ़ने का कारण समझिये: इसे पहचानिए , बच्चे को गुस्से के स्त्रोत से दूर कीजिये। उन्हें शांत रहने के लिए प्रोत्साहित करें, अगर वे ऐसा करते है तो उन्हें उनकी मर्ज़ी का कुछ अच्छा काम करने का वादा कीजिये। उन्हें कहिये कि अगर वे ऐसा करेंगे तो ताकतवर, बड़े व समझदार बनेंगे।. उनसे वादा कीजिये कि आप उन्हें कहानी सुनायेंगे, साथ समय व्यतीत करेंगे, उनके साथ खेलेंगे जो भी उन्हें अच्छा लगता है। अगर वे ऐसा करते हैं तो आप भी अपना वादा ज़रूर पूरा करें।
  8. साथ में समय व्यतीत करें: मात्र 5 मिनट का सकारात्मक समय उन्हें उनकी भावनाओ को हल करने व् आपका दृष्टिकोण समझने में बहुत मदद करेगा। केवल आप और आपका बच्चा बिना किसी अवरोध के, एक दूसरे से बात करे, उसे लाड-प्यार दे | यह आपके लिए भी बहुत आनंददायक क्षण होगा |

ये सभी सुझाव काम करते हैं। कभी ये तो कभी वो, पर काम जरुर करते है | उन्हें सिखाते-सिखाते हम भी बहुत कुछ सीख जाते है|

नोट: लेखिका, ऋतू सिंह, तुलसी नगर, इंदौर शाखा की प्रधानाध्यापिका हैं। उन्हें भारत व विदेश में शिक्षा के क्षेत्र में कई वर्षों का अनुभव है। यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English version: http://www.gyankriti.com/blog/i-am-here-and-i-want-this-tantrum-king/

रचना सक्सेना द्वारा अनुवादित |

बच्चों को खिलोनों का महत्त्व समझाये

“मेरी बेटी के पास बहुत सारे खिलौने हैं, किन्तु वह उनका महत्त्व नहीं समझती।”- विद्या गौर, जो एक सात साल की बच्ची की माँ हैं | विद्या खुद दो तीन खिलौनों के साथ बड़ी हुयी, और हर साल जन्मदिन पर एक नया खिलौना उनमे जुड़ जाता था ।आजकल के सुविधायुक्त जीवन में बच्चे टोकरी भर खिलौनों के साथ बड़े होते हैं, और बहुत मुश्किल है उन्हें यह समझाना कि भारत के 4 करोड़ 80 लाख में से अधिकतम बच्चों के लिए ये खिलौने कितने अनमोल हैं।

“मुझे कोई चिंता नहीं अगर मेरा खिलौना टूट जाता है, मुझे नया मिल जायेगा।” यह कहना है 6 साल के रिषभ वर्मा का। उसे नहीं पता कि उसके माता पिता को ऐसे कथन क्यों पसंद नहीं। रिषभ की ही तरह अनेक मध्यम वर्गीय बच्चे परवाह नहीं करते यदि उनके खिलौने गुम हो जाये या टूट जाये, क्योकि उन्हें पता है कि उन्हें दूसरे मिल जायेंगे।

यहाँ कुछ तरीके है जिससे बच्चों को वस्तुओं का महत्त्व समझाने में मदद होगी –

जरूरतमंद लोगों को बांटना

उनका ध्यान उन बच्चों की तरफ आकर्षित करें जो इन सुख सुविधाओं से वंचित हैं। समझाईये कि वे कम कपड़े व भोजन और बिना खिलौनों के साथ कैसे जीते हैं। अपने बच्चों से कहिये कि वे उन भोजन, कपड़े और खिलौनों के पैकेट बनाये जो उनके लिए पुराने हो गए हैं। उनकी पसंद आपसे अलग हो सकती है, किन्तु उन्हें स्वीकारने के लिए तैयार रहें।एक उपयुक्त परिवार को ढूंढे जिसे यह पैकेट दे सकें। ये परिवार निर्माण करने वाले मजदूर जो टेंट में रहते हैं या फिर आपके नौकर भी हो सकते हैं। हांलाकि बच्चों को यह समझाना भी आवश्यक है कि जब वे समाज के दूसरे तबके के लोगों से मिलें तो बहुत ज्यादा दया, घृणा या नम्रता न दिखाएँ। साथ में जाईये और उन्हें वो पैकेट दीजिये। चैरिटी करने से आपके बच्चे को एहसास होगा कि कम सुविधाओं वाले बच्चों के लिए ये कपड़े और खिलौने कितने मूल्यवान हैं और साथ ही उन्हें चैरिटी का सुखद अनुभव भी होगा।

नई चीजों की जांच करना

जन्मदिन पर ढेर सारे तोहफे मिल जाने पर कुछ तोहफे उतने आकर्षक नहीं लगते | इस्तेमाल करने से पहले अपने बच्चे को पहले हर नयी चीज़ को ध्यान से देखने दें।अगर वे कोई ऐसे खिलौने/गेम/पाठ्यसामग्री है जो बच्चे के पास पहले से है, या उसे उसकी आवश्यकता नहीं है, तो वह उसे एक बक्से में सम्हाल कर रख ले। ऐसे तोहफे किसी जरूरतमंद को दे सकते है, तोहफे के रूप में किसी और को दे सकते हैं या बाद में उपयोग में ले सकते हैं|

रीसायकल करना

पुराने खिलौने किसी दूकान या वेबसाइट पर बेचे भी जा सकते हैं। इस तरह बच्चे जागरूक होंगे कि उन चीज़ों को किसी को देकर या बेचकर कुछ समझदारी का कम कर रहे हैं बजाये के घर पर  बिना उपयोग में लाये पड़े हुए हैं। इसके बदले में उन्हें अनुमति दी जा सकती है कि उन्हें जिस चीज़ की आवश्यकता है वो खरीद सकते हैं।

उत्सुकता बढ़ाये

कोई भी नयी वस्तु उपहार में देने से पहले उसके बारे में बच्चे से बात करके या इन्टरनेट पर उससे सम्बंधित सामग्री दिखाकर दिलचस्पी बढ़ाये। एक बार उसकी जिज्ञासा प्रज्वलित हो गयी वो उस वस्तु का महत्त्व समझेगा।

अनुचित प्रयोग को नियंत्रित करें

यदि आपका बच्चा अपने खिलौनों को लेकर लापरवाह है, उन्हें फेंकता है या बिस्तर के नीचे धकेलता है, उनसे वह वापस ले लीजिये। जब तक आपको नहीं लगता कि वह दोबारा ऐसा नहीं करेगा, खिलौना अपने पास ही रखिये, या किसी को दे दीजिये।जब वह उस खिलौने को गँवा देगा तब वह उसके लिए जरुरत बन जायेगा, हो सकता है वह आपसे वो खिलौना मांग ले इसलिए कुछ देर उसे अपने पास ही रखिये|

नोट: लेखक, योगराज पटेल, ज्ञानकृति के संस्थापक एवं निदेशक है| यहाँ व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

English version: http://www.gyankriti.com/blog/does-your-child-value-her-toys/

रचना सक्सेना द्वारा अनुवादित |

“I AM HERE AND I WANT THIS” – Tantrum King

Becoming parents requires no degree; also it does not guarantee our understanding the psychology of the little ones. Sometimes we are so baffled when small pin like situations arise and we are in a fix. How to deal with this one? One among the many is

“Children seeking attention and throwing tantrums”

Humans have the longest relationship nourishing period; it stretches according to the culture of the country. The moment a child arrives to the parent, it becomes the centre of attraction for them. Then starts the fussing, loving and nurturing part. Do we also teach the children to play by themselves, to be with themselves? This turns into a habit by the time a child turns 2 years old. For them we are always around, we are always there, their insecurities are covered up and their desires fulfilled. In the process of readying them for the society, we start a reverse process of denials, saying no, don’t, afterwards. This initiates a different problem in child seeking our uninterrupted attention by throwing tantrum.

Here are some helpful tips to deal with this:

  1. Health: First and foremost check the vitals. See, if the child has his needs taken care of. Whether or not he is either, hungry, thirsty, sick or tired. Once this is done move to other steps of how to deal with it.
  2. Ignore and Walk away: It seems to be an awkward way when we think about it. “Is this the way? “But believe me it works. It is the first step to introduce them to their own selves and not to seek attention all the time. By doing this they come to know “This doesn’t work”. Also, it gives them time to work on their emotions.
  3. Avert / Act silly: This works wonders. Just distract them towards something else from their immediate focus of attention. Point out to something else, show them something interesting, tell them a secret, and sing them a song. Innocent minds can be distracted easily. Act silly, topple over, fall down, just anything to distract. Practice the trick and OH! It can be so much easier.
  4. Stay Calm as You Seek: Is this not what it is all about. You desire for the child to stay calm when the situation is making him/her to throw tantrum. Tell the child let’s reason it out later. If you start yelling and shouting, then the child may never be able to understand. What is this fuss all about as you are reciprocating in the same way? Be the role model in displaying the calm and coolness in all the adverse situations. Love them when they display themselves as the role modelled representations of your coolness and calmness.
  5. Don’t give In: After all this is why you took the first decision of saying “no”. Suddenly, after the tantrum it cannot become right. Also, once you give in the child has discovered a new way of getting his wish fulfilled. Be careful, either say yes at the start if it does not matter in the child’s development, but do not change your decision to “yes” once said no.
  6. Tickle: This works wonderfully well. I have tried. Every time I need my son to listen to me and comply I tickle. It actually ends a complex situation on a positive note. Also, who can resist tickling? It also introduces them to laughter and smiles. And hormone to help them to do so works its wonders.
  7. The temper behind the tantrum:   Recognize it; try to remove the child from the source of the temper. Encourage them to hold it a bit longer, promise them incentives if they do so. Tell them, they grow a bit stronger, bigger, and mature if they do so. Promise them stories, together time, a play whatever interests them. Treat them as equal when they are able to deal with it.
  8. Attention time: Why not? Just five minutes of absolute positive attention time to them may help them resolve their own feelings and understand your point of view of saying no…Or other child’s reaction. Just you and your child without distractions, sharing, communication, love and care. Just pure pleasure.

All of the above works. One or the other at one of the time. It is just us learning and making them learn in the process.

Note: The author is Head Mistress at Tulsi Nagar, Indore Branch. She has several years of experience in education at reputed schools in India and abroad.

The views expressed here are personal.

हिंदी अनुवाद: http://www.gyankriti.com/blog/tantrum-hindi/

Does your child value her toys?

“My daughter has a cupboard full of toys, but doesn’t value them at all!” laments Vidya Gour the mother of a seven-year-old. Vidya herself grew up with two or three toys, with a new one added every birthday.

Today privileged children grow up with full baskets of and it’s hard to get them to understand how precious or valuable they are for the majority of India’s 480 million children.

“I don’t care if my toy breaks. I’ll get a new one,” says six-year-old Rishabh Verma. He has no clue why his parents don’t like such statements. Like Rishabh, many middle class kids couldn’t care less if they lose or break toys, since they have so many others to replace them.

Here are some ways to help children learn to value things.

Give away stuff:
Draw attention to the vast majority of underprivileged children. Explain how they manage — with few clothes, less food, and often no toys at all. Get your children to make packages of food, clothes and toy which they have out grown. Their choices are likely to be different from yours, but be willing to accommodate them. Identify a suitable family to give the packages to. It could be the family of construction workers living in tents, or your house helper. However it’s important to warn children not to outwardly show pity, disgust or condescension when they in interact with people from other sections of society. Go together and present the packages to them. Learning to practice charity will help your child realise how valuable every toy and dress is for the less privileged and will help them experience the joy of giving.

Examine new things:
A flood of birthday gifts can make some presents less appealing than others. Get your child to examine each new object before using it. If it is a toy/game/stationary she already has, or does not want, she should place it in a box for reuse. Such gifts could be given away to needy children, reused as a gift, or used later. Sifting will discourage your child from taking a new toy, playing with it for a few minutes, and then forgetting all about it.

Old toys can be recycled simply by selling them in a locally or on a second-hand goods website. This way children will become aware that they are doing something sensible by gifting or selling stuff, instead of letting it lie unused at home. They could be allowed to use the money realised to buy what they need.

Create hype: Before gifting your child a new object, generate some interest by talking about it, or showing internet content related to it. Once her curiosity is kindled, she will value it.

Withhold toys: If you find your child handling toys carelessly, throwing them around, or shoving them under the bed, take them away. Keep it with you until you think they will use it well, or give it away. Losing a toy usually makes it a ‘wanted’ object, so keep it for a while, in case your child asks for it again.

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

हिंदी अनुवाद: http://www.gyankriti.com/blog/hindi-toys-value/

Tips for Handling the First Days of Preschool

Tip 1: Don’t rush through the morning: No one likes to race through the school morning routine — especially on the first day. So get everyone up at a reasonable hour. That way, you won’t have to hurry your child as he munches through his morning meal — or risk being late because you had to tame your frazzled tot’s tantrum.

Tip 2: Arrive fashionably early: This way, your little one can slowly settle in before the real action starts. He’ll also get more face time with the teacher, too, which will be tougher to do once all the other kids are there to vie for her attention.

Tip 3: Bring a comfort object: Let your child bring along his favorite stuffed animal (or blanket, or whatever object does the trick) so the new setting doesn’t feel so scary. And once your teddy-toting tot feels comfortable with his surroundings, he’ll let go of his lovey — or at least leave it when he plays.

Tip 4: Put on a happy face: Anxiety may be eating you up inside, but don’t let on — nerves are highly contagious. If your tone’s upbeat and you seem confident that your child will have a good time, there’s a better chance that he’ll be upbeat, too.

Tip 5: Hang around, but don’t hover: We sometimes allow parents stay in the classroom for all or part of the first few days, so if you can swing it, stick around. Knowing that you’re within clinging distance will give your kid the courage to explore his new digs. Then, as your child feels more secure, gradually melt into the background. Your goal is to let the teacher take over so you can get on with your day.

Tip 6: Keep good-byes short and sweet: When it’s your cue to make an exit, hold back your tears a little longer (smiling helps unscrunch those furrows in your worried brow), give your new preschooler a hug, and let him know when you’ll be back (“I’ll pick you up after lunch”). Then head out — don’t linger (he can’t get on with his day until you do). And no matter how tempting, never sneak out when your preschooler is looking the other way. It’ll make him feel insecure and less trusting.

Just remember, it’s normal for kids to have a meltdown when it’s time to separate (though many don’t). But even if your child is crying a lot, chances are he’ll be fine five minutes after you walk out the door. If it’s taking a while for your little one to adjust, don’t panic — our teachers (and their assistants) have seen it all and they know just what to do, so ask his teacher for help. Just don’t be surprised if your child’s too happy to say hello to you (or talk about his day) once preschool pick up rolls around!

Note: The author is Founder-Director of Gyankriti. The views expressed here are personal.

Montessori Resources for Parents and Teachers

We at Gyankriti believe that parents, teachers and students are the three pillars in early childhood education. We have always promised to avail best and experienced teachers, however the results depend largely on support of the parents. In our attempt to educate parents towards Early Childhood Care and Education we are sharing some good Montessori resources that I came across in my travels along the internet highway. I hope that this information will be really helpful for parents during summer vacations.

Information about Dr Maria Montessori


The Wonder Years – A Montessori home environment

Parenting for independence blogpost

Practical life in the home – a good list of undertakings that a child will appreciate

Summer vacation – a practical life approach

Summer reading ideas

Montessori at home: the senses

Montessori prepared environment at home

How to create a prepared environment


Montessori for everyone – Montessori home schooling

Moose Huntress – Montessori at home website

Adventures of a rainbow mama


The Montessori Merthod for the Infant Toddler

Baby’s Montessori room

23 month old making his own snack, montessori


Montessori videos on You Tube

Montessori videos on Vimeo

Montessori for infants and toddlers

A general Montessori website

Montessori content on Blogger

Montessori images on Flickr


Montessori on the shelf

Moveable alphabet

Montessorri: Planting the seeds of learning

PS: If you have any other good resources than please share them in comments. Thanks! 🙂

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